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Friday, May 25, 2012

बाजार और मीडिया के बीच भारतीय भाषाएं

हिंदी और भारतीय भाषाओं को लेकर समाज में एक अजीब सा सन्नाटा है। संचार व
मीडिया की भाषा पर कोई बात नहीं करना चाहता। उसके जायज-नाजायज इस्तेमाल और भाषा
में दूसरी भाषाओं खासकर अंग्रेजी की मिलावट को लेकर भी कोई प्रतिरोध नजर नहीं आ
रहा है। ठेठ हिंदी का ठाठ जैसे अंग्रेजी के आतंक के सामने सहमा पड़ा है और
हिंदी और भारतीय भाषाओं के समर्थक एक अजीब निराशा से भर उठे हैं। ऐसे में
मीडिया की दुनिया में इन दिनों भाषा का सवाल काफी गहरा हो जाता है। मीडिया में
जैसी भाषा का इस्तेमाल हो रहा है उसे लेकर शुध्दता के आग्रही लोगों में काफी
हाहाकार व्याप्त है। चिंता हिंदी की है और उस हिंदी की जिसका हमारा समाज उपयोग
करता है। बार-बार ये बात कही जा रही है कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में
अंग्रेजी की मिलावट से हमारी भाषाएं अपना रूप-रंग-रस और गंध खो रही है।

बाजार की सबसे प्रिय भाषाः


हिंदी हमारी भाषा के नाते ही नहीं,अपनी उपयोगिता के नाते भी आज बाजार की सबसे
प्रिय भाषा है। आप लाख अंग्रेजी के आतंक का विलाप करें। काम तो आपको हिंदी में
ही करना है, ये मरजी आपकी कि आप अपनी स्क्रिप्ट देवनागरी में लिखें या रोमन
में। यह हिंदी की ही ताकत है कि वह सोनिया गांधी से लेकर कैटरीना कैफ सबसे
हिंदी बुलवा ही लेती है। उड़िया न जानने के आरोप झेलनेवाले नेता नवीन पटनायक भी
हिंदी में बोलकर ही अपनी अंग्रेजी न जानने वाली जनता को संबोधित करते हैं। इतना
ही नहीं प्रणव मुखर्जी की सुन लीजिए वे कहते हैं कि वे प्रधानमंत्री नहीं बन
सकते क्योंकि उन्हें ठीक से हिंदी बोलनी नहीं आती। कुल मिलाकर हिंदी आज मीडिया,
राजनीति,मनोरंजन और विज्ञापन की प्रमुख भाषा है। हिंदुस्तान जैसे देश को एक
भाषा से सहारे संबोधित करना हो तो वह सिर्फ हिंदी ही है। यह हिंदी का अहंकार
नहीं उसकी सहजता और ताकत है। मीडिया में जिस तरह की हिंदी का उपयोग हो रहा है
उसे लेकर चिंताएं बहुत जायज हैं किंतु विस्तार के दौर में ऐसी लापरवाहियां हर
जगह देखी जाती हैं। कुछ अखबार प्रयास पूर्वक अपनी श्रेष्टता दिखाने अथवा युवा
पाठकों का ख्याल रखने के नाम पर हिंग्लिश परोस रहे हैं जिसकी कई स्तरों पर
आलोचना भी हो रही है। हिंग्लिश का उपयोग चलन में आने से एक नई किस्म की भाषा का
विस्तार हो रहा है। किंतु आप देखें तो वह विषयगत ही ज्यादा है। लाइफ स्टाइल,
फिल्म के पन्नों, सिटी कवरेज में भी लाइट खबरों पर ही इस तरह की भाषा का प्रभाव
दिखता है। चिंता हिंदी समाज के स्वभाव पर भी होनी चाहिए कि वह अपनी भाषा के
प्रति बहुत सम्मान भाव नहीं रखता, उसके साथ हो रहे खिलवाड़ पर उसे बहुत आपत्ति
नहीं है। हिंदी को लेकर किसी तरह का भावनात्मक आधार भी नहीं बनता, न वह अपना
कोई ऐसा वृत्त बनाती है जिससे उसकी अपील बने।

समर्थ बोलियों का संसारः

हिंदी की बोलियां इस मामले में ज्यादा समर्थ हैं क्योंकि उन्हें क्षेत्रीय
अस्मिता एक आधार प्रदान करती है। हिंदी की सही मायने में अपनी कोई जमीन नहीं
है। जिस तरह भोजपुरी, अवधी, छत्तीसगढ़ी, बुंदेली, बधेली, गढ़वाली,
मैथिली,बृजभाषा जैसी तमाम बोलियों ने बनाई है। हिंदी अपने व्यापक विस्तार के
बावजूद किसी तरह का भावनात्मक आधार नहीं बनाती। सो इसके साथ किसी भी तरह की
छेड़छाड़ किसी का दिल भी नहीं दुखाती। मीडिया और मनोरंजन की पूरी दुनिया हिंदी
के इसी विस्तारवाद का फायदा उठा रही है किंतु जब हिंदी को देने की बारी आती है
तो ये भी उससे दोयम दर्जे का ही व्यवहार करते हैं। यह समझना बहुत मुश्किल है कि
विज्ञापन, मनोरंजन या मीडिया की दुनिया में हिंदी की कमाई खाने वाले अपनी
स्क्रिप्ट इंग्लिश में क्यों लिखते हैं। देवनागरी में किसी स्क्रिप्ट को लिखने
से क्या प्रस्तोता के प्रभाव में कमी आ जाएगी, फिल्म फ्लाप हो जाएगी या मीडिया
समूहों द्वारा अपने दैनिक कामों में हिंदी के उपयोग से उनके दर्शक या पाठक भाग
जाएंगें। यह क्यों जरूरी है कि हिंदी के अखबारों में अंग्रेजी के स्वनामधन्य
लेखक, पत्रकार एवं स्तंभकारों के तो लेख अनुवाद कर छापे जाएं उन्हें मोटा
पारिश्रमिक भी दिया जाए किंतु हिंदी में मूल काम करने वाले पत्रकारों को मौका
ही न दिया जाए। हिंदी के अखबार क्या वैचारिक रूप से इतने दरिद्र हैं कि उनके
अखबारों में गंभीरता तभी आएगी जब कुछ स्वनामधन्य अंग्रेजी पत्रकार उसमें अपना
योगदान दें। यह उदारता क्यों। क्या अंग्रेजी के अखबार भी इतनी ही सदाशयता से
हिंदी के पत्रकारों के लेख छापते हैं।

रोमन में हो रहा है कामः

पूरा विज्ञापन बाजार हिंदी क्षेत्र को ही दृष्टि में रखकर विज्ञापन अभियानों को
प्रारंभ करता है किंतु उसकी पूरी कार्यवाही देवनागरी के बजाए रोमन में होती है।
जबकि अंत में फायनल प्रोडक्ट देवनागरी में ही तैयार होना है। गुलामी के ये भूत
हमारे मीडिया को लंबे समय से सता रहे हैं। इसके चलते एक चिंता चौतरफा व्याप्त
है। यह खतरा एक संकेत है कि क्या कहीं देवनागरी के बजाए रोमन में ही तो हिंदी न
लिखने लगी जाए। कई बड़े अखबार भाषा की इस भ्रष्टता को अपना आर्दश बना रहे हैं।
जिसके चलते हिंदी सरमायी और सकुचाई हुई सी दिखती है। शीर्षकों में कई बार पूरा
का शब्द अंग्रेजी और रोमन में ही लिख दिया जा रहा है। जैसे- मल्लिका का BOLD
STAP या इसी तरह कौन बनेगा PM जैसे शीर्षक लगाकर आप क्या करना चाहते हैं। कई
अखबार अपने हिंदी अखबार में कुछ पन्ने अंग्रेजी के भी चिपका दे रहे हैं। आप ये
तो तय कर लें यह अखबार हिंदी का है या अंग्रेजी का। रजिस्ट्रार आफ न्यूजपेपर्स
में जब आप अपने अखबार का पंजीयन कराते हैं तो नाम के साथ घोषणापत्र में यह भी
बताते हैं कि यह अखबार किस भाषा में निकलेगा क्या ये अंग्रेजी के पन्ने जोड़ने
वाले अखबारों ने द्विभाषी होने का पंजीयन कराया है। आप देखें तो पंजीयन हिंदी
के अखबार का है और उसमें दो या चार पेज अंग्रेजी के लगे हैं। हिंदी के साथ ही
आप ऐसा कर सकते हैं। संभव हो तो आप हिंग्लिश में भी एक अखबार निकालने का प्रयोग
कर लें। संभव है वह प्रयोग सफल भी हो जाए किंतु इससे भाषायी अराजकता तो नहीं
मचेगी।

हिंदी के खिलाफ मनमानीः

हिंदी में जिस तरह की शब्द सार्मथ्य और ज्ञान-विज्ञान के हर अनुशासन पर अपनी
बात कहने की ताकत है उसे समझे बिना इस तरह की मनमानी के मायने क्या हैं। मीडिया
की बढ़ी ताकत ने उसे एक जिम्मेदारी भी दी है। सही भाषा के इस्तेमाल से नई पीढ़ी
को भाषा के संस्कार मिलेंगें। बाजार में हर भाषा के अखबार मौजूद हैं, मुझे
अंग्रेजी पढ़नी है तो मैं अंग्रेजी के अखबार ले लूंगा, वह अखबार नहीं लूंगा
जिसमें दस हिंदी के और चार पन्ने अंग्रेजी के भी लगे हैं। इसी तरह मैं अखबार के
साथ एक रिश्ता बना पाता हूं क्योंकि वह मेरी भाषा का अखबार है। अगर उसमें भाषा
के साथ खिलवाड़ हो रहा है तो क्या जरूरी है मैं आपके इस खिलवाड़ का हिस्सा
बनूं। यह दर्द हर संवेदनशील हिंदी प्रेमी का है। हिंदी किसी जातीय अस्मिता की
भाषा भले न हो यह इस महादेश को संबोधित करनेवाली सबसे समर्थ भाषा है। इस सच्चाई
को जानकर ही देश का मीडिया, बाजार और उसके उपादान अपने लक्ष्य पा सकते हैं।
क्योंकि हिंदी की ताकत को कमतर आंककर आप ऐसे सच से मुंह चुरा रहे हैं जो सबको
पता है। हजारों-हजार गीत, कविताएं, साहित्य, शिल्प और तमाम कलाएं नष्ट होने के
कगार पर हैं। किंतु उनके गुणग्राहक कहां हैं। एक विशाल भू-भाग में बोली जाने
वाली हजारों बोलियां, उनका साहित्य-जो वाचिक भी है और लिखित भी। उसकी कलाचेतना,
प्रदर्शन कलाएं सारा कुछ मिलकर एक ऐसा लोक रचती है जिस तक पहुंचने के लिए अभी
काफी समय लगेगा। लोकचेतना तो वेदों से भी पुरानी है। क्योंकि हमारी परंपरा में
ही ज्ञान बसा हुआ है। ज्ञान, नीति-नियम, औषधियां, गीत, कथाएं, पहेलियां सब कुछ
इसी ‘लोक’ का हिस्सा हैं। हिंदी अकेली भाषा है जिसका चिकित्सक भी ‘कविराय’ कहा
जाता था। बाजार आज सारे मूल्य तय कर रहा है और यह ‘लोक’ को नष्ट करने का
षडयंत्र है। यह सही मायने में बिखरी और कमजोर आवाजों को दबाने का षडयंत्र भी
है। इसका सबसे बड़ा शिकार हमारी बोलियां बन रही हैं, जिनकी मौत का खतरा मंडरा
रहा है। अंडमान की ‘बो’ नाम की भाषा खत्म होने के साथ इसका सिलसिला शुरू हो गया
है। भारतीय भाषाओं और बोलियों के सामने यह सबसे खतरनाक समय है। आज के मुख्यधारा
के मीडिया के पास इस संदर्भों पर काम करने का अवकाश नहीं है। किंतु समाज के
प्रतिबद्ध पत्रकारों, साहित्यकारों को आगे आकर इस चुनौती को स्वीकार करने की
जरूरत है क्योंकि ‘लोक’ की उपेक्षा और बोलियों को नष्ट कर हम अपनी प्रदर्शन
कलाओं, गीतों, शिल्पों और विरासतों को गंवा रहे हैं। जबकि इसके संरक्षण की
जरूरत है।

बढ़ती ताकत के बावजूद उपेक्षाः

भारतीय भाषाओं के प्रकाशन आज अपनी प्रसार संख्या और लोकप्रियता के मामले में
अंग्रेजी पर भारी है, बावजूद इसके उसका सम्मान बहाल नहीं हो रहा है। इंडियन
रीडरशिप सर्वे की रिपोर्ट देंखें तो सन् 2011 के आंकडों में देश के दस सर्वाधिक
पढ़े जाने वाले अखबारों में अंग्रेजी का एक मात्र अखबार है वह भी छठें स्थान
पर। जिसमें पहले तीन स्थान हिंदी अखबारों के लिए सुरक्षित हैं। यानि कुल पहले
10 अखबारों में 9 अखबार भारतीय भाषाओं के हैं। आईआरएस जो एक विश्वसनीय पाठक
सर्वेक्षण है के मुताबिक अखबारों की पठनीयता का क्रम इस प्रकार है-

1.दैनिक जागरण (हिंदी)

2. दैनिक भास्कर (हिंदी)

3.हिंदुस्तान (हिंदी)

4. मलयालम मनोरमा( मलयालम)

5.अमर उजाला (हिंदी)

6.द टाइम्स आफ इंडिया (अंग्रेजी)

7.लोकमत (मराठी)

8.डेली थांती (तमिल)

9.राजस्थान पत्रिका (हिंदी)

10. मातृभूमि (मलयालम)

देश की सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली पत्रिकाओं में भी पहले 10 स्थान पर अंग्रेजी के
मात्र दो प्रकाशन शामिल हैं। इंडियन रीडरशिप सर्वे के 2011 के आंकड़े देखें तो
देश में सर्वाधिक प्रसार संख्या वाली पत्रिका वनिता (मलयालम) है। दूसरा स्थान
हिंदी के प्रकाशन प्रतियोगिता दर्पण को प्राप्त है। देश में सर्वाधिक पढ़ी जाने
वाली पत्रिकाओं का क्रम इस प्रकार हैः

वनिता (मलयालम)-पाक्षिक

प्रतियोगिता दर्पण (हिंदी)-मासिक

सरस सलिल( हिंदी)-पाक्षिक

सामान्य ज्ञान दर्पण (हिंदी)-मासिक

इंडिया टुडे (अंग्रेजी)-साप्ताहिक

मेरी सहेली (हिंदी)-मासिक

मलयालया मनोरमा (मलयालम)-साप्ताहिक

क्रिकेट सम्राट (हिंदी)-मासिक

जनरल नालेज टुडे (अंग्रेजी)-मासिक

कर्मक्षेत्र (बंगला)-साप्ताहिक ( स्रोतः आईआरएस-2011 क्यू फोर)

भाषा के अपमान का सिलसिलाः

इस संकट के बरक्स हम भाषा के अपमान का सिलसिला अपनी शिक्षा में भी देख सकते
हैं। हालात यह हैं कि मातृभाषाओं में शिक्षा देने के सारे जतन आज विफल हो चुके
हैं। जो पीढ़ी आ रही है उसके पास हिंग्लिस ही है। वह किसी भाषा के साथ अच्छा
व्यवहार करना नहीं जानती है। शिक्षा खासकर प्राथमिक शिक्षा में भाषाओं की
उपेक्षा ने सारा कुछ गड़बड़ किया है। इसके चलते हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर चुके
हैं जिनमें भारतीय भाषाओं और हिंदी के लिए आदर नहीं है। इसलिए पापुलर का पाठ
गाता मीडिया भी ऐसी मिश्रित भाषा के पीछे भागता है। साहित्य के साथ पत्रकारिता
की बढ़ी दूरी और भाषा के साथ अलगाव ने मीडिया को एक नई तरह की भाषा और पदावली
दी है। जिसमें वह संवाद तो कर रहा है किंतु उसे आत्मीय संवाद में नहीं बदल पा
रहा है। जिस भाषा के मीडिया का साहित्य से एक खास रिश्ता रहा हो, उसकी
पत्रकारिता ने ही हिंदी को तमाम शब्द दिए हों और भाषा के विकास में एक खास
भूमिका निभायी हो, उसकी बेबसी चिंता में डालती है। भाषा, साहित्य और मीडिया के
इस खास रिश्ते की बहाली जरूरी है। क्योंकि मीडिया का असर उसकी व्यापकता को
देखते हुए साहित्य की तुलना में बहुत बड़ा है। किंतु साहित्य और भाषा के आधार
अपने मीडिया की रचना खड़ी करना जरूरी है,क्योंकि इनके बीच में अंतरसंवाद से
मीडिया का ही लाभ है। वह समाज को वे तमाम अनुभव भी दे पाएगा जो मीडिया की
तुरंतवादी शैली में संभव नहीं हो पाते। पापुलर को साधते हुए मीडिया को उसे भी
साधना होगा जो जरूरी है। मीडिया का एक बड़ा काम रूचियों का परिष्कार भी है। वह
तभी संभव है जब वह साहित्य और भाषा से प्रेरणाएं ग्रहण करता रहे। भाषा की सहजता
से आगे उसे भाषा के लोकव्यापीकरण और उसके प्रति सम्मान का भाव भी जगाना है तभी
वह सही मायने में ‘भारत का मीडिया’ बन पाएगा।

प्रस्तुतिः संजय द्विवेदी


लेखक परिचय

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के
अध्यक्ष हैं। संपर्कः अध्यक्ष, जनसंचार विभाग,माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय
पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय,प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल(मप्र) मोबाइलः 098935-98888
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कुछ टिप्पणियां 

किसी भाषा की शिक्षा सर्वप्रथम घर और परिवार से आरंभ होती है जैसे अन्य संस्कार
घर से शुरू होते है .घर प्रार्थमिक पाठशाला है इसलिए इस समस्या के जड़ की तलाश
वहीँ करनी चाहिए .घर के बुजुर्ग ही इस पर ध्यान दे कि बच्चा जो भाषा बोल रहा है
वह शुद्ध है या नहीं .इसके लिए उसे भी अपनी भाषा का परिमार्जन करते रहना होगा
.यदि हम अंग्रेजी बोल रहे है तो उसे भी सही बोलना चाहिए ताकि बच्चे उसे भी ठीक
से बोल सके .पर जब हम ही भाषा का प्रयोग सही ढंग से न कर रहे हों तो दूसरे को
दोष देना उचित नहीं है.रही संचार माध्यमो द्वारा भाषाओँ के दुरूपयोग का तो उस
तरफ अधिक ध्यान देने कि आवश्यकता नहीं है क्योंकि उसकी स्थिति एक मदारी या तेल
बेचने वाले से अधिक नहीं है. क्योंकि भाषा को तोडना और मरोड़ना  इनके व्यवसाय से
जुडा रहता है. इनसे भाषा की शुद्धता अपेच्छा करना ही गलत है. यह हमें ध्यान देना
है कि इससे हमारी भाषा में विकृति न आ जाये किसी भी प्रकार के प्रदूषण के लिए
हम स्वयं को सुरक्षित करने का प्रयत्न करते है तो उसी प्रकार भाषा के प्रदूषण
के लिए सुर क्षात्मक उपाय करने चाहिए जो भी बन पड़े वह कदम उठाना चाहिए .मैंने
पढ़ा है कि देवकीनंदन खत्री की चन्द्रकांता पढने के लिए बहुतो ने हिंदी भाषा
सीखी उसी प्रकार हम आज भी ऐसा कर सकते है की शुद्ध हिंदी सीखने के लिए लोग विवश
हो जाये. मैंने देखा है की लोग लिखने और बोलने में लिंग बोध और कारक चिन्हों का
गलत प्रयोग करते है पर इसका जरा भी उन्हें दुःख नहीं होता है और न ही अपमान बोध
का .जन्म देने वाली माँ के बाद भाषा को ही दूसरी माँ समझना चाहिए.पर इसका यह
आशय नहीं है कि दूसरी भाषा नहीं सीखनी चाहिए पर कोई अपनी माँ का अनादर कर दूसरी
स्त्री को वह सम्मान नहीं देता है तो वह भाषा के साथ ऐसा कैसे कर सकता है.?
अर्थात नहीं कर सकता है .होना तो यह चाहिए कि हम अधिक से अधिक भाषा सीखने को
तत्पर रहे पर निज भाषा कि उन्नति की ओर प्रयास करते रहे भाषा राजनीति का प्रश्न
न हो कर संस्कृति का विषय बननी चाहिए .इसके लिए विभिन्न भाषाओँ के साहित्य का
आदान प्रदान होना चाहिए. और इसके लिए पढने की आदत डालनी चाहिए.जो आजकल समाप्त
हो रही है.इस ओर भी प्रयास करना होगा .

बिपिन कुमार सिन्हा

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भाषा परिवर्तन परिष्कृति (संस्कृत-संस्कृति) की दिशा में हो, विकृति की दिशामें
नहीं.

(१) “मिडिया” शब्द तो हमारे माध्यम का ही अंग्रेज़ी बना “मीडियम” शब्दका बहुवचन
है. उसे हम वापस उधार ले रहे हैं.

वाह वाह.

जो अन्ग्रेजी ने हम से लिया था, उसी को वापस?

इस से अधिक बुद्धूपना क्या हो सकता है?

(२) उसी प्रकार हमारे “केंद्र” से ही अंग्रेज़ी C E N T R E (केंत्र -केंटर –और
बाद में सेंटर बना) बड़ी कृतज्ञता से, उसे वापस ला रहे हैं, सेंटर शब्द स्वीकार
कर ?

(३) हमारे माध्यम शब्दसे माध्यमिक, मध्यम, माध्यमिकता. माध्यमि, मध्यावधि,
सुमध्य, मध्यांतर, माध्यमीय, मध्यस्थ, मध्यस्थी—-ऐसे १६० तक, अनेक शब्द साथ
मिलकर, अपना पूरा परिवार हमारी सेवामें तैयार हो जाता है|

—-कोई ऐसा, “मिडिया” शब्द से कर के दिखाए|

(४) ऐसा ही केंद्र से भी किया जा सकता है.

(५) अंग्रेजी को दीये हुए, शब्दों को ही अलग रूपमें वापस लाकर देने वाली हिंदी
को ही भिखारन बना दिया?

सारे संचार माध्यम के अज्ञानियों को प्रशिक्षित करना पड़ेगा.

यह भाषा प्रदुषण क्षमा की योग्यता नहीं रखता.

बड़ी देर भई है भाई –बड़ी देर भई है.

- डॉ मधुसूदन

Thursday, May 24, 2012

औषधीय अन्न "जौ" (Barley)

हमारे ऋषियों-मुनियों का प्रमुख आहार जौ ही था। वेदों द्वारा यज्ञ की आहुति के रूप में जौ को स्वीकारा गया है। जौ को भूनकर, पीसकर, उस आटे में थोड़ा-सा नमक और पानी मिलाने पर सत्तू बनता है। कुछ लोग सत्तू में नमक के स्थान पर गुड़ डालते हैं व सत्तू में घी और शक्कर मिलाकर भी खाया जाता है। गेंहू , जौ और चने को बराबर मात्रा में पीसकर आटा बनाने से मोटापा कम होता है और ये बहुत पौष्टिक भी होता है .राजस्थान में भीषण गर्मी से निजात पाने के लिए सुबह सुबह जौ की राबड़ी का सेवन किया जाता है .

अगर आपको ब्लड प्रेशर की शिकायत है और आपका पारा तुरंत चढ़ता है तो फिर जौ को दवा की तरह खाएँ। हाल ही में हुए एक अध्ययन में दावा किया गया है कि जौ से ब्लड प्रेशर कंट्रोल होता है।कच्चा या पकाया हुआ जौ नहीं बल्कि पके हुए जौ का छिलका ब्लड प्रेशर से बहुत ही कारगर तरीके से लड़ता है।

यह नाइट्रिक ऑक्साइड और हाइड्रोजन सल्फाइड जैसे रसायनिक पदार्थे के निर्माण को बढ़ा देता है और उनसे खून की नसें तनाव मुक्त हो जाती हैं।

उत्तर प्रदेश के फैजाबाद स्थित नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय ने इस नयी किस्म नरेंद्र जौ अथवा उपासना को विकसित किया है और हाल ही में उत्तर भारत के किसानों के लिए जारी किया गया है। नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉक्टर सियाराम विश्वकर्मा ने बताया कि इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि यह छिलका रहित है। उपासना में बीटाग्लूकोन ग्लूटेन की कम मात्रा सुपाच्य रेशो एसिटिल कोलाइन (कार्बोहाइड्रेट पदार्थ) पाया जाता है।

इसमें फोलिक विटामिन भी पाया जाता है। यही कारण है कि इसके सेवन से रक्तचाप मधुमेह पेट एवं मूष संबंधी बीमारी गुर्दे की पथरी याद्दाश्त की समस्या आदि से निजात दिलाता है।

इसमें एंटी कोलेस्ट्रॉल तत्व भी पाया जाता है।



यह उत्तर भारत के मैदानी इलाकों उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर और गुजरात की एक महत्वपूर्ण रबी फसल है।

इसका उपयोग औषधि के रूप मे किया जा सकता है । जौ के निम्न औषधीय गुण है :

- कंठ माला- जौ के आटे में धनिये की हरी पत्तियों का रस मिलाकर रोगी स्थान पर लगाने से कंठ माला ठीक हो जाती है।
- मधुमेह (डायबटीज)- छिलका रहित जौ को भून पीसकर शहद व जल के साथ सत्तू बनाकर खायें अथवा दूध व घी के साथ दलिया का सेवन पथ्यपूर्वक कुछ दिनों तक लगातार करते करते रहने से मधूमेह की व्याधि से छूटकारा पाया जा सकता है।
- जलन- गर्मी के कारण शरीर में जलन हो रही हो, आग सी निकलती हो तो जौ का सत्तू खाने चाहिये। यह गर्मी को शान्त करके ठंडक पहूचाता है और शरीर को शक्ति प्रदान करता है।
- मूत्रावरोध- जौ का दलिया दूध के साथ सेवन करने से मूत्राशय सम्बन्धि अनेक विकार समाप्त हो जाते है।
- गले की सूजन- थोड़ा सा जौ कूट कर पानी में भिगो दें। कुछ समय के बाद पानी निथर जाने पर उसे गरम करके उसके कूल्ले करे। इससे शीघ्र ही गले की सूजन दूर हो जायेगी।
- ज्वर- अधपके या कच्चे जौ (खेत में पूर्णतः न पके ) को कूटकर दूध में पकाकर उसमें जौ का सत्तू मिश्री, घी शहद तथा थोड़ा सा दूघ और मिलाकर पीने से ज्वर की गर्मी शांत हो जाती है।
- मस्तिष्क का प्रहार- जौ का आटा पानी में घोलकर मस्तक पर लेप करने से मस्तिष्क की पित्त के कारण हूई पीड़ा शांत हो जाती है।
- अतिसार- जौ तथा मूग का सूप लेते रहने से आंतों की गर्मी शांत हो जाती है। यह सूप लघू, पाचक एंव संग्राही होने से उरःक्षत में होने वाले अतिसार (पतले दस्त) या राजयक्ष्मा (टी. बी.) में हितकर होता है।
- मोटापा बढ़ाने के लिये- जौ को पानी भीगोकर, कूटकर, छिलका रहित करके उसे दूध में खीर की भांति पकाकर सेवन करने से शरीर पर्यात हूष्ट पुष्ट और मोटा हो जाता है।
- धातु-पुष्टिकर योग- छिलके रहित जौ, गेहू और उड़द समान मात्रा में लेकर महीन पीस लें। इस चूर्ण में चार गुना गाय का दूध लेकर उसमे इस लुगदी को डालकर धीमी अग्नि पर पकायें। गाढ़ा हो जाने पर देशी घी डालकर भून लें। तत्पश्चात् चीनी मिलाकर लड्डू या चीनी की चाशनी मिलाकर पाक जमा लें। मात्रा 10 से 50 ग्राम। यह पाक चीनी व पीतल-चूर्ण मिलाकर गरम गाय के दूध के साथ प्रातःकाल कुछ दिनों तक नियमित लेने से धातु सम्बन्धी अनेक दोष समाप्त हो जाते हैं ।
- पथरी- जौ का पानी पीने से पथरी निकल जायेगी। पथरी के रोगी जौ से बने पदार्थ लें।
- गर्भपात- जौ का छना आटा, तिल तथा चीनी-तीनों सममात्रा में लेकर महीन पीस लें। उसमें शहद मिलाकर चाटें।
- कर्ण शोध व पित्त- पित्त की सूजन अथवा कान की सूजन होने पर जौ के आटे में ईसबगोल की भूसी व सिरका मिलाकर लेप करना लाभप्रद रहता है।
- आग से जलना- तिल के तेल में जौ के दानों को भूनकर जला लें। तत्पश्चात् पीसकर जलने से उत्पन्न हुए घाव या छालों पर इसे लगायें, आराम हो जायेगा। अथवा जौ के दाने अग्नि में जलाकर पीस लें। वह भस्म तिल के तेल में मिलाकर रोगी स्थान पर लगानी चाहियें।
- जौ की राख को शहद के साथ
चटाने से खांसी ठीक हो जाती है |
- जौ की राख को पानी में खूब उबालने से यवक्षार बनता है जो किडनी को ठीक कर देता है |

Friday, March 16, 2012

अरब की प्राचीन समृद्ध वैदिक संस्कृति और भारत


अरब देश का भारत, भृगु के पुत्र शुक्राचार्य तथा उनके पोत्र और्व से
ऐतिहासिक संबंध प्रमाणित है, यहाँ तक कि "हिस्ट्री ऑफ पर्शिया" के लेखक
साइक्स का मत है कि अरब का नाम और्व के ही नाम पर पड़ा, जो विकृत होकर
"अरब" हो गया। भारत के उत्तर-पश्चिम में इलावर्त था, जहाँ दैत्य और दानव
बसते थे, इस इलावर्त में एशियाई रूस का दक्षिणी-पश्चिमी भाग, ईरान का
पूर्वी भाग तथा गिलगित का निकटवर्ती क्षेत्र सम्मिलित था। आदित्यों का
आवास स्थान-देवलोक भारत के उत्तर-पूर्व में स्थित हिमालयी क्षेत्रों में
रहा था। बेबीलोन की प्राचीन गुफाओं में पुरातात्त्विक खोज में जो भित्ति
चित्र मिले है, उनमें विष्णु को हिरण्यकशिपु के भाई हिरण्याक्ष से युद्ध
करते हुए उत्कीर्ण किया गया है।

उस युग में अरब एक बड़ा व्यापारिक केन्द्र रहा था, इसी कारण देवों, दानवों
और दैत्यों में इलावर्त के विभाजन को लेकर 12 बार युद्ध 'देवासुर
संग्राम' हुए। देवताओं के राजा इन्द्र ने अपनी पुत्री ज्यन्ती का विवाह
शुक्र के साथ इसी विचार से किया था कि शुक्र उनके (देवों के) पक्षधर बन
जायें, किन्तु शुक्र दैत्यों के ही गुरू बने रहे। यहाँ तक कि जब दैत्यराज
बलि ने शुक्राचार्य का कहना न माना, तो वे उसे त्याग कर अपने पौत्र और्व
के पास अरब में आ गये और वहाँ 10 वर्ष रहे। साइक्स ने अपने इतिहास ग्रन्थ
"हिस्ट्री ऑफ पर्शिया" में लिखा है कि 'शुक्राचार्य लिव्ड टेन इयर्स इन
अरब'। अरब में शुक्राचार्य का इतना मान-सम्मान हुआ कि आज जिसे 'काबा'
कहते है, वह वस्तुतः 'काव्य शुक्र' (शुक्राचार्य) के सम्मान में निर्मित
उनके आराध्य भगवान शिव का ही मन्दिर है। कालांतर में 'काव्य' नाम विकृत
होकर 'काबा' प्रचलित हुआ। अरबी भाषा में 'शुक्र' का अर्थ 'बड़ा' अर्थात
'जुम्मा' इसी कारण किया गया और इसी से 'जुम्मा' (शुक्रवार) को मुसलमान
पवित्र दिन मानते है।
"बृहस्पति देवानां पुरोहित आसीत्, उशना काव्योऽसुराणाम्"-जैमिनिय ब्रा.
(01-125)
अर्थात बृहस्पति देवों के पुरोहित थे और उशना काव्य (शुक्राचार्य) असुरों
के।

प्राचीन अरबी काव्य संग्रह गंथ 'सेअरूल-ओकुल' के 257वें पृष्ठ पर हजरत
मोहम्मद से 2300 वर्ष पूर्व एवं ईसा मसीह से 1800 वर्ष पूर्व पैदा हुए
लबी-बिन-ए-अरव्तब-बिन-ए-तुरफा ने अपनी सुप्रसिद्ध कविता में भारत भूमि
एवं वेदों को जो सम्मान दिया है, वह इस प्रकार है-
"अया मुबारेकल अरज मुशैये नोंहा मिनार हिंदे।
व अरादकल्लाह मज्जोनज्जे जिकरतुन।1।
वह लवज्जलीयतुन ऐनाने सहबी अरवे अतुन जिकरा।
वहाजेही योनज्जेलुर्ररसूल मिनल हिंदतुन।2।
यकूलूनल्लाहः या अहलल अरज आलमीन फुल्लहुम।
फत्तेबेऊ जिकरतुल वेद हुक्कुन मालन योनज्वेलतुन।3।
वहोबा आलमुस्साम वल यजुरमिनल्लाहे तनजीलन।
फऐ नोमा या अरवीयो मुत्तवअन योवसीरीयोनजातुन।4।
जइसनैन हुमारिक अतर नासेहीन का-अ-खुबातुन।
व असनात अलाऊढ़न व होवा मश-ए-रतुन।5।"
अर्थात-(1) हे भारत की पुण्यभूमि (मिनार हिंदे) तू धन्य है, क्योंकि
ईश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझको चुना। (2) वह ईश्वर का ज्ञान प्रकाश,
जो चार प्रकाश स्तम्भों के सदृश्य सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, यह
भारतवर्ष (हिंद तुन) में ऋषियों द्वारा चार रूप में प्रकट हुआ। (3) और
परमात्मा समस्त संसार के मनुष्यों को आज्ञा देता है कि वेद, जो मेरे
ज्ञान है, इनके अनुसार आचरण करो।(4) वह ज्ञान के भण्डार साम और यजुर है,
जो ईश्वर ने प्रदान किये। इसलिए, हे मेरे भाइयों! इनको मानो, क्योंकि ये
हमें मोक्ष का मार्ग बताते है।(5) और दो उनमें से रिक्, अतर (ऋग्वेद,
अथर्ववेद) जो हमें भ्रातृत्व की शिक्षा देते है, और जो इनकी शरण में आ
गया, वह कभी अन्धकार को प्राप्त नहीं होता।
इस्लाम मजहब के प्रवर्तक मोहम्मद स्वयं भी वैदिक परिवार में हिन्दू के
रूप में जन्में थे, और जब उन्होंने अपने हिन्दू परिवार की परम्परा और वंश
से संबंध तोड़ने और स्वयं को पैगम्बर घोषित करना निश्चित किया, तब संयुक्त
हिन्दू परिवार छिन्न-भिन्न हो गया और काबा में स्थित महाकाय शिवलिंग
(संगे अस्वद) के रक्षार्थ हुए युद्ध में पैगम्बर मोहम्मद के चाचा उमर-बिन-
ए-हश्शाम को भी अपने प्राण गंवाने पड़े। उमर-बिन-ए-हश्शाम का अरब में एवं
केन्द्र काबा (मक्का) में इतना अधिक सम्मान होता था कि सम्पूर्ण अरबी
समाज, जो कि भगवान शिव के भक्त थे एवं वेदों के उत्सुक गायक तथा हिन्दू
देवी-देवताओं के अनन्य उपासक थे, उन्हें अबुल हाकम अर्थात 'ज्ञान का
पिता' कहते थे। बाद में मोहम्मद के नये सम्प्रदाय ने उन्हें ईष्यावश अबुल
जिहाल 'अज्ञान का पिता' कहकर उनकी निन्दा की।
जब मोहम्मद ने मक्का पर आक्रमण किया, उस समय वहाँ बृहस्पति, मंगल,
अश्विनी कुमार, गरूड़, नृसिंह की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित थी। साथ ही एक
मूर्ति वहाँ विश्वविजेता महाराजा बलि की भी थी, और दानी होने की
प्रसिद्धि से उसका एक हाथ सोने का बना था। 'Holul' के नाम से अभिहित यह
मूर्ति वहाँ इब्राहम और इस्माइल की मूर्त्तियो के बराबर रखी थी। मोहम्मद
ने उन सब मूर्त्तियों को तोड़कर वहाँ बने कुएँ में फेंक दिया, किन्तु तोड़े
गये शिवलिंग का एक टुकडा आज भी काबा में सम्मानपूर्वक न केवल प्रतिष्ठित
है, वरन् हज करने जाने वाले मुसलमान उस काले (अश्वेत) प्रस्तर खण्ड
अर्थात 'संगे अस्वद' को आदर मान देते हुए चूमते है।

प्राचीन अरबों ने सिन्ध को सिन्ध ही कहा तथा भारतवर्ष के अन्य प्रदेशों
को हिन्द निश्चित किया। सिन्ध से हिन्द होने की बात बहुत ही अवैज्ञानिक
है। इस्लाम मत के प्रवर्तक मोहम्मद के पैदा होने से 2300 वर्ष पूर्व यानि
लगभग 1800 ईश्वी पूर्व भी अरब में हिंद एवं हिंदू शब्द का व्यवहार ज्यों
का त्यों आज ही के अर्थ में प्रयुक्त होता था।
अरब की प्राचीन समृद्ध संस्कृति वैदिक थी तथा उस समय ज्ञान-विज्ञान, कला-
कौशल, धर्म-संस्कृति आदि में भारत (हिंद) के साथ उसके प्रगाढ़ संबंध थे।
हिंद नाम अरबों को इतना प्यारा लगा कि उन्होंने उस देश के नाम पर अपनी
स्त्रियों एवं बच्चों के नाम भी हिंद पर रखे।
अरबी काव्य संग्रह ग्रंथ ' सेअरूल-ओकुल' के 253वें पृष्ठ पर हजरत मोहम्मद
के चाचा उमर-बिन-ए-हश्शाम की कविता है जिसमें उन्होंने हिन्दे यौमन एवं
गबुल हिन्दू का प्रयोग बड़े आदर से किया है । 'उमर-बिन-ए-हश्शाम' की कविता
नयी दिल्ली स्थित मन्दिर मार्ग पर श्री लक्ष्मीनारायण मन्दिर (बिड़ला
मन्दिर) की वाटिका में यज्ञशाला के लाल पत्थर के स्तम्भ (खम्बे) पर काली
स्याही से लिखी हुई है, जो इस प्रकार है -
" कफविनक जिकरा मिन उलुमिन तब असेक ।
कलुवन अमातातुल हवा व तजक्करू ।1।
न तज खेरोहा उड़न एललवदए लिलवरा ।
वलुकएने जातल्लाहे औम असेरू ।2।
व अहालोलहा अजहू अरानीमन महादेव ओ ।
मनोजेल इलमुद्दीन मीनहुम व सयत्तरू ।3।
व सहबी वे याम फीम कामिल हिन्दे यौमन ।
व यकुलून न लातहजन फइन्नक तवज्जरू ।4।
मअस्सयरे अरव्लाकन हसनन कुल्लहूम ।
नजुमुन अजा अत सुम्मा गबुल हिन्दू ।5।
अर्थात् - (1) वह मनुष्य, जिसने सारा जीवन पाप व अधर्म में बिताया हो,
काम, क्रोध में अपने यौवन को नष्ट किया हो। (2) अदि अन्त में उसको
पश्चाताप हो और भलाई की ओर लौटना चाहे, तो क्या उसका कल्याण हो सकता है ?
(3) एक बार भी सच्चे हृदय से वह महादेव जी की पूजा करे, तो धर्म-मार्ग
में उच्च से उच्च पद को पा सकता है। (4) हे प्रभु ! मेरा समस्त जीवन लेकर
केवल एक दिन भारत (हिंद) के निवास का दे दो, क्योंकि वहाँ पहुँचकर मनुष्य
जीवन-मुक्त हो जाता है। (5) वहाँ की यात्रा से सारे शुभ कर्मो की
प्राप्ति होती है, और आदर्श गुरूजनों (गबुल हिन्दू) का सत्संग मिलता है ।

--- विश्वजीत सिंह 'अनंत'

Thursday, March 15, 2012

राष्ट्रीय डायन अंग्रेजी - साभार - डॉ वेद प्रताप वैदिक

अंग्रेजी राष्ट्रीय डायन है। वह हर साल हमारे करोड़ों बच्चों को नोच-नोचकर खाती जाती है लेकिन हमें पता ही नहीं चलता। हम हमारे 20 करोड़ बच्चों को हर साल पूतना के पालने में फेंककर खुश होते रहते हैं। हम मानकर चलते हैं कि पूतना बलिष्ठ है, विशालकाय है, दुग्धा है। उसकी छत्रछाया में पलेंगे तो ये बच्चे बड़े होकर बड़ी-बड़ी नौकरियां पकड़ लेंगे, पैसा और सम्मान कमाएंगे और विदेशों में छलांग लगाएंगे। यह लालच हमारी आंखों पर पट्टी बांध देता है। देश के करोड़ों ग्रामीण, गरीब, दलित और पिछड़े बच्चे रोज़ तिल-तिलकर मरते जाते हैं। यह सामूहिक मौत इतनी अदृश्य और आहिस्ता है कि हमें इसकी भनक तक नहीं लगती लेकिन जब अनिल कुमार मीणा और बालमुकुंद भारती जैसे लड़के फांसी लगाकर आत्महत्या कर लेते हैं तो हमारा दिल करूणा से भर उठता है और हम सोचने लगते हैं कि हाय, इन आदिवासी और दलित छात्रों को मरने से कैसे बचाया जाए? इनकी अक्षमता को दूर कैसे किया जाए? इनकी अयोग्यता की भरपाई कैसे हो? हम कितने दयालु हैं?

सच्चाई तो यह है कि हम दयालु नहीं हैं, हम मूर्ख हैं। हमारी सरकारें मूर्ख हैं, हमारे शिक्षाशास्त्री मूर्ख हैं, हमारे नेता मूर्ख हैं। हम मूर्ख इसलिए हैं कि हम झूठ को सच मानकर आगे बढ़ना चाहते हैं। हमने इस झूठ को सच मान लिया है कि मेडिकल इंस्टीट्यूट में आत्महत्या करनेवाले छात्र पढ़ाई में कमजोर थे। इसी कारण वे हर साल फेल हो जाते थे। इसीलिए हताश होकर वे आत्महत्या कर लेते हैं। यह शुद्ध झूठ है। यदि वे पढ़ाई में कमजोर थे तो यह बताइए कि 12 वीं कक्षा की पढ़ाई तक वे हमेशा सर्वोच्च अंक कैसे प्राप्त करते रहे? मेडिकल की अत्यंत कठिन भर्ती परीक्षा में अनिल मीणा के 75 प्रतिशत नंबर कैसे आए? अनिल और बालमुकुंद, एक आदिवासी और एक दलित, ये दोनों नौजवान अपने-अपने परिवार और गांव की आंख के तारे थे लेकिन मेडिकल इंस्टीट्यूट में भर्ती होते से ही उन्हें क्या हो गया? वे फेल क्यों हो गए?

Tuesday, February 14, 2012

बच्चों को पढ़ाने की भाषा - साभार डॉ वेद प्रताप वैदिक

भारत के बच्चों को कैसी भाषा में पढ़ाया जाए, इस बात की सुध हमारे मानव संसाधन मंत्रालय को अब आई है| उसने राज्यों को निर्देश भिजवाएं हैं कि बच्चों को ऐसी भाषा में पढ़ाया जाए, जो उनके घरों में बोली जाती हो|
क्या खूब सुझाव है ! इसे कहते हैं कि अकल का अतिरेक! बच्चों को सरल-सहज स्वाभाविक भाषा में पढ़ाया जाए या मातृभाषा में पढ़ाया जाए, इस सिद्घांत का पालन करने की बजाय अब यह नया मुहावरा गढ़ा जा रहा है| बोलचाल की भाषा का मतलब क्या है? न तो उसमें उच्चारण की, न व्याकरण की और न ही समझ की एकरूपता होती है| वह तो बोली होती है| अगर बोली में पढ़ाई होगी तो ये बच्चे आगे जाकर ऐसी भाषा का प्रयोग करेंगे, जो एक-दूसरे को समझ में ही नहीं आएगी| यह संवाद की अराजकता बन जाएगी| बोली हुई और लिखी हुई भाषाओं में सदा गहरा अंतर होता है| उस अंतर को ध्यान में रखते हुए ही बच्चों को पढ़ाया जाना चाहिए|
लेकिन बोली हुई भाषा में पढ़ाने का आग्रह करनेवाले अफसरों का हमें स्वागत करना होगा, क्योंकि कुल मिलाकर उनका आग्रह मातृभाषाओं पर आकर ही टिकेगा| इस देश में जब तक उन सब स्कूलों पर प्रतिबंध नहीं लगेगा, जो बच्चों को विदेशी भाषा के माध्यम से पढ़ाते हैं, मातृभाषा के माध्यम की पढ़ाई अच्छी हो ही नहीं पाएगी| हमारे केंद्र और राज्य के शिक्षा मंत्रालयों का बर्ताव किसी गुलाम देश के शिक्षा-मंत्रालयों की तरह रहा है| उन्होंने अंग्रेजी माध्यम के तथाकथित पब्लिक स्कूलों का कभी विरोध ही नहीं किया| सारी दुनिया के महान शिक्षाविदों की राय है कि बच्चों को विदेशी भाषा के माध्यम से पढ़ाने पर उनकी बुद्घि कुंठित हो जाती है, उनकी मौलिकता नष्ट हो जाती है, वे रट्टू-तोते बन जाते हैं| यूरोप के बच्चों पर जब अंग्रेजी थोपी गई तो मालूम पड़ा कि ज्यादातर बच्चों को अनिद्रा, विस्मरण और कंपन आदि की बीमारियां हो गई| हमारे देश में तो जिन बच्चों पर अंग्रेजी थोपी जाती है, उन्हें एक भयंकर रोग हो जाता है| उसका नाम है, उच्चता ग्रंथि! इस उच्चता के अभिमान में वे अपने देश, परिवार और माता-पिता से भी कट जाते हैं| वे भारतीय नहीं रहते| वे इंडियन बन जाते हैं| इसी गलत शिक्षा नीति के कारण हमारे एक देश में दो देश खड़े हो गए है| ‘शिक्षा मंत्रालयका नाम बदलकर मानव संसाधन मंत्रालय कर दिया गया| मनुष्य को जो साध्य नहीं, साधन बना दे, क्या हम उसे शिक्षा कहेंगे? शिक्षा के नाम पर देश में अशिक्षा फैलानेवाले हमारे नेताओं ने ज्ञान आयोग भी बनाया है, जिसका काम देश में अज्ञान फैलाना है| देश में अशिक्षा और अज्ञान फैलानेवाले नेताओं से जब तक छुटकारा नहीं होगा, हमारे बच्चों की पढ़ाई नहीं सुधरेगी|

Sunday, January 29, 2012

आधुनिक विज्ञान - भारतीय गाय ही विश्व की मूल गाय

आधुनिक विज्ञान का यह मानना है कि सृष्टि के आदि काल में, भूमध्य रेखा के दोनो ओर प्रथम एक गर्म भूखंड उत्पन्न हुवा था ..इसे भारतीय परम्परा मे जम्बुद्वीप नाम दिया जाता है. सभी स्तन धारी भूमी पर पैरों से चलने वाले प्राणी दोपाए, चौपाए जिन्हें वैज्ञानिक भाशा मे अ‍ॅग्युलेट मेमल ungulate mammal के नाम से जाना जाता है, वे इसी जम्बू द्वीप पर उत्पन्न हुवे थे.इस प्रकार सृष्टि में सब से प्रथम मनुष्य और गौ का इसी जम्बुद्वीप भूखंड पर उत्पन्न होना माना जाता है. इस प्रकार यह भी सिद्ध होता है कि भारतीय गाय ही विश्व की मूल गाय है. इसी मूल भारतीय गाय का लगभग 8000 साल पहले, भारत जैसे गर्म क्षेत्रों से Europe के ठंडे क्षेत्रों के लिए पलायन हुवा माना जाता है.
 
जीव विज्ञान के अनुसार भारतीय गायों के 209 तत्व के डीएनए DNA में 67 पद पर स्थित एमिनो एसिड प्रोलीन Proline पाया जाता है. इन गौओं के ठंडे यूरोपीय देशों को पलायन में भारतीय गाय के डीएनए में प्रोलीन Proline एमीनोएसिड हिस्टीडीन Histidine के साथ उत्परिवर्तित हो गया. इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक भाषा में म्युटेशन Mutation कहते हैं.

(Ref Ng-Kwai-Hang KF,Grosclaude F.2002.:Genetic polymorphism of milk proteins . In:PF Fox and McSweeney PLH (eds),Advanced Dairy Chemistry,737-814, Kluwer Academic/Plenum Publishers, New York)

(देखें-Kwai-रुको KF, Grosclaude F.2002:. दूध प्रोटीन की जेनेटिक बहुरूपता. में: पीएफ फॉक्स और McSweeney PLH सम्पादित लेख “ उन्नत डेयरी रसायन विज्ञान ,737-814, Kluwer शैक्षणिक / सर्वागीण सभा प्रकाशक, न्यूयॉर्क)

1. मूल गाय के दूध में Proline अपने स्थान 67 पर बहुत दृढता से आग्रह पूर्वक अपने पडोसी स्थान 66 पर स्थित अमीनोएसिड आइसोल्यूसीन Isoleucine से जुडा रहता है. परन्तु जब प्रोलीन के स्थान पर हिस्टिडीन आ जाता है तब इस हिस्टिडीन में अपने पडोसी स्थान 66 पर स्थित आइसोल्युसीन से जुडे रहने की प्रबल इच्छा नही पाई जाती. इस स्थिति में यह एमिनो एसिड Histidine, मानव शरीर की पाचन कृया में आसानी से टूट कर बिखर जाता है. इस प्रक्रिया से एक 7 एमीनोएसिड का छोटा प्रोटीन स्वच्छ्न्द रूप से मानव शरीर में अपना अलग आस्तित्व बना लेता है. इस 7 एमीनोएसिड के प्रोटीन को बीसीएम 7 BCM7 (बीटा Caso Morphine7) नाम दिया जाता है.

2. BCM7 एक Opioid (narcotic) अफीम परिवार का मादक तत्व है. जो बहुत शक्तिशाली Oxidant ऑक्सीकरण एजेंट के रूप में मानव स्वास्थ्य पर अपनी श्रेणी के दूसरे अफीम जैसे ही मादक तत्वों जैसा दूरगामी दुष्प्रभाव छोडता है. जिस दूध में यह विषैला मादक तत्व बीसीएम 7 पाया जाता है, उस दूध को वैज्ञानिको ने ए1 दूध का नाम दिया है. यह दूध उन विदेशी गौओं में पाया गया है जिन के डीएन मे 67 स्थान पर प्रोलीन न हो कर हिस्टिडीन होता है.
 
आरम्भ में जब दूध को बीसीएम7 के कारण बडे स्तर पर जानलेवा रोगों का कारण पाया गया तब न्यूज़ीलेंड के सारे डेरी उद्योग के दूध का परीक्षण आरम्भ हुवा. सारे डेरी दूध पर करे जाने वाले प्रथम अनुसंधान मे जो दूध मिला वह बीसीएम7 से दूषित पाया गया. इसी लिए यह सारा दूध ए1 कह्लाया
 
तदुपरांत ऐसे दूध की खोज आरम्भ हुई जिस मे यह बीसीएम7 विषैला तत्व न हो. इस दूसरे अनुसंधान अभियान में जो बीसीएम7 रहित दूध पाया गया उसे ए2 नाम दिया गया. सुखद बात यह है कि विश्व की मूल गाय की प्रजाति के दूध मे, यह विष तत्व बीसीएम7 नहीं मिला,
इसी लिए देसी गाय का दूध ए2 प्रकार का दूध पाया जाता है.
 
देसी गाय के दूध मे यह स्वास्थ्य नाशक मादक विष तत्व बीसीएम7 नही होता. आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान से अमेरिका में यह भी पाया गया कि ठीक से पोषित देसी गाय के दूध और दूध के बने पदार्थ मानव शरीर में कोई भी रोग उत्पन्न नहीं होने देते. भारतीय परम्परा में इसी लिए देसी गाय के दूध को अमृत कहा जाता है. आज यदि भारतवर्ष का डेरी उद्योग हमारी देसी गाय के ए2 दूध की उत्पादकता का महत्व समझ लें तो भारत सारे विश्व डेरी दूध व्यापार में सब से बडा दूध निर्यातक देश बन सकता है.
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देसी गाय की पहचान

आज के वैज्ञानिक युग में , यह भी महत्व का विषय है कि देसी गाय की पहचान प्रामाणिक तौर पर हो सके.साधारण बोल चाल मे जिन गौओं में कुकुभ , गल कम्बल छोटा होता है उन्हे देसी नही माना जात, और सब को जर्सी कह दिया जाता है. प्रामाणिक रूप से यह जानने के लिए कि कौन सी गाय मूल देसी गाय की प्रजाति की हैं गौ का डीएनए जांचा जाता है. इस परीक्षण के लिए गाय की पूंछ के बाल के एक टुकडे से ही यह सुनिश्चित हो जाता है कि वह गाय देसी गाय मानी जा सकती है या नहीं . यह अत्याधुनिक विज्ञान के अनुसन्धान का विषय है. पाठकों की जान कारी के लिए भारत सरकार से इस अनुसंधान के लिए आर्थिक सहयोग के प्रोत्साहन से भारतवर्ष के वैज्ञानिक इस विषय पर अनुसंधान कर रहे हैं और निकट भविष्य में वैज्ञानिक रूप से देसी गाय की पहचान सम्भव हो सकेगी. इस महत्वपूर्ण अनुसंधान का कार्य दिल्ली स्थित महाऋषि दयानंद गोसम्वर्द्धन केंद्र की पहल और भागीदारी पर और कुछ भारतीय वैज्ञानिकों के निजी उत्साह से आरम्भ हो सका है.

ए1 दूध का मानव स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव 

जन्म के समय बालक के शरीर मे blood brain barrier नही होता . माता के स्तन पान कराने के बाद तीन चार वर्ष की आयु तक शरीर में यह ब्लडब्रेन बैरियर स्थापित हो जाता है .इसी लिए जन्मोपरांत माता के पोषन और स्तन पान द्वारा शिषु को मिलने वाले पोषण का, बचपन ही मे नही, बडे हो जाने पर भविष्य मे मस्तिष्क के रोग और शरीर की रोग निरोधक क्षमता ,स्वास्थ्य, और व्यक्तित्व के निर्माण में अत्यधिक महत्व बताया जाता है .

बाल्य काल के रोग

आजकल भारत वर्ष ही में नही सारे विश्व मे , जन्मोपरान्त बच्चों में जो Autism बोध अक्षमता और Diabetes type1 मधुमेह जैसे रोग बढ रहे हैं उन का स्पष्ट कारण ए1 दूध का बीसीएम7 पाया गया है.

वयस्क समाज के रोग 

मानव शरीर के सभी metabolic degenerative disease शरीर के स्वजन्य रोग जैसे उच्च रक्त चाप high blood pressure हृदय रोग Ischemic Heart Disease तथा मधुमेह Diabetes का प्रत्यक्ष सम्बंध बीसीएम 7 वाले ए1 दूध से स्थापित हो चुका है.यही नही बुढापे के मांसिक रोग भी बचपन में ए1 दूध का प्रभाव के रूप मे भी देखे जा रहे हैं.

दुनिया भर में डेयरी उद्योग आज चुपचाप अपने पशुओं की प्रजनन नीतियों में \'\' अच्छा दूध अर्थात् BCM7 मुक्त ए2 दूध “ के उत्पादन के आधार पर बदलाव ला रही हैं. वैज्ञानिक शोध इस विषय पर भी किया जा रहा है कि किस प्रकार अधिक ए2 दूध देने वाली गौओं की प्रजातियां विकसित की जा सकें.
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डेरी उद्योग की भूमिका

मुख्य रूप से यह हानिकारक ए1 दूध होल्स्टिन फ्रीज़ियन प्रजाति की गाय मे ही मिलता है, यह भैंस जैसी दीखने वाली, अधिक दूध देने के कारण सारे डेरी उद्योग की पसन्दीदा गाय है. होल्स्टीन फ्रीज़ियन दूध के ही कारण लगभग सारे विश्व मे डेरी का दूध ए1 पाया गया . विश्व के सारे डेरी उद्योग और राजनेताओं की आज यही कठिनाइ है कि अपने सारे ए1 दूध को एक दम कैसे अच्छे ए2 दूध मे परिवर्तित करें. आज विश्व का सारा डेरी उद्योग भविष्य मे केवल ए2 दूध के उत्पादन के लिए अपनी गौओं की प्रजाति मे नस्ल सुधार के नये कार्य क्रम चला रहा है. विश्व बाज़ार मे भारतीय नस्ल के गीर वृषभों की इसी लिए बहुत मांग भी हो गयी है. साहीवाल नस्ल के अच्छे वृषभ की भी बहुत मांग बढ गयी है.
 
सब से पहले यह अनुसंधान न्यूज़ीलेंड के वैज्ञानिकों ने किया था.परन्तु वहां के डेरी उद्योग और सरकारी तंत्र की मिलीभगत से यह वैज्ञानिक अनुसंधान छुपाने के प्रयत्नों से उद्विग्न होने पर, 2007 मे Devil in the Milk-illness, health and politics A1 and A2 Milk” नाम की पुस्तक Keith Woodford कीथ वुड्फोर्ड द्वारा न्यूज़ीलेंड मे प्रकाशित हुई. उपरुल्लेखित पुस्तक में विस्तार से लगभग 30 वर्षों के विश्व भर के आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और रोगों के अनुसंधान के आंकडो के आधार पर यह सिद्ध किया जा सका है कि बीसीएम7 युक्त ए1 दूध मानव समाज के लिए विष तुल्य है.

इन पंक्तियों के लेखक ने भारतवर्ष मे 2007 में ही इस पुस्तक को न्युज़ीलेंड से मंगा कर भारत सरकार और डेरी उद्योग के शीर्षस्थ अधिकारियों का इस विषय पर ध्यान आकर्षित कर के देसी गाय के महत्व की ओर वैज्ञानिक आधार पर प्रचार और ध्यानाकर्षण का एक अभियान चला रखा है.परन्तु अभी भारत सरकार ने इस विषय को गम्भीरता से नही लिया है.

डेरी उद्योग और भारत सरकार के गोपशु पालन विभाग के अधिकारी व्यक्तिगत स्तर पर तो इस विषय को समझने लगे हैं परंतु भारतवर्ष की और डेरी उद्योग की नीतियों में बदलाव के लिए जिस नेतृत्व की आवश्यकता होती है उस के लिए तथ्यों के अतिरिक्त सशक्त जनजागरण भी आवश्यक होता है. इस के लिए जन साधारण को इन तथ्यों के बारे मे अवगत कराना भारत वर्ष के हर देश प्रेमी गोभक्त का दायित्व बन जाता है.

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देसी गाय से विश्वोद्धार

भारत वर्ष में यह विषय डेरी उद्योग के गले आसानी से नही उतर रहा, हमारा समस्त डेरी उद्योग तो हर प्रकार के दूध को एक जैसा ही समझता आया है. उन के लिए देसी गाय के ए2 दूध और विदेशी ए1 दूध देने वाली गाय के दूध में कोई अंतर नही होता था. गाय और भैंस के दूध में भी कोई अंतर नहीं माना जाता. सारा ध्यान अधिक मात्रा में दूध और वसा देने वाले पशु पर ही होता है. किस दूध मे क्या स्वास्थ्य नाशक तत्व हैं, इस विषय पर डेरी उद्योग कभी सचेत नहीं रहा है. सरकार की स्वास्थ्य सम्बंदि नीतियां भी इस विषय पर केंद्रित नहीं हैं.
 
भारत में किए गए NBAGR (राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो) द्वारा एक प्रारंभिक अध्ययन के अनुसार यह अनुमान है कि भारत वर्ष में ए1 दूध देने वाली गौओं की सन्ख्या 15% से अधिक नहीं है. भरत्वर्ष में देसी गायों के संसर्ग की संकर नस्ल ज्यादातर डेयरी क्षेत्र के साथ ही हैं .

आज सम्पूर्ण विश्व में यह चेतना आ गई है कि बाल्यावस्था मे बच्चों को केवल ए2 दूध ही देना चाहिये. विश्व बाज़ार में न्युज़ीलेंड, ओस्ट्रेलिया, कोरिआ, जापान और अब अमेरिका मे प्रमाणित ए2 दूध के दाम साधारण ए1 डेरी दूध के दाम से कही अधिक हैं .ए2 से देने वाली गाय विश्व में सब से अधिक भारतवर्ष में पाई जाती हैं. यदि हमारी देसी गोपालन की नीतियों को समाज और शासन का प्रोत्साहन मिलता है तो सम्पूर्ण विश्व के लिए ए2 दूध आधारित बालाहार का निर्यात भारतवर्ष से किया जा सकता है. यह एक बडे आर्थिक महत्व का विषय है.
 
छोटे ग़रीब किसनों की कम दूध देने वाली देसी गाय के दूध का विश्व में जो आर्थिक महत्व हो सकता है उस की ओर हम ने कई बार भारत सरकार का ध्यान दिलाने के प्रयास किये हैं. परन्तु दुख इस बात का है कि गाय की कोई भी बात कहो तो उस मे सम्प्रदायिकता दिखाई देती है, चाहे कितना भी देश के लिए आर्थिक और समाजिक स्वास्थ्य के महत्व का विषय हो.

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गाय का पहला दूध हमें स्वाइन फ्लू से बचाएगा

अब हमें स्वाइन फ्लू से बचाने \'गौ माता\' आ रही हैं। जी हां, एक तरफ दुनिया एच1एन1 वायरस से जूझ रही है तो दूसरी तरफ देश की मिल्क कैपिटल के तौर पर मशहूर आणंद में गाय का दूध अपनी तमाम खूबियों की बदौलत इसका मुकाबला करने को तैयार हो रहा है।
 
अमूल लगभग 50 दशकों से देश को \'अटर्री, बटर्ली, डिलिशस\' मिल्क प्रॉडक्ट बेच रहा है। पर अब अमूल ने अब इस घातक वायरस के खिलाफ मोर्चाबंदी करने के लिए मुंबई की एक कंपनी से हाथ मिलाया है। यह कंपनी हाल ही में बच्चों को जन्म देने वाली गायों का पहला दूध इकट्ठा कर रही है। गौरतलब है कि यह दूध नवजात बछड़ों में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। अमूल का विचार एक ऐसा ओरल स्प्रे बनाने का है जो इंसानों के इम्यून सिस्टम को एचआईवी और एच1एन1 वायरसों से बचा सके।
 
यह दूध अमूल के मिल्क कोऑपरेटिव से इकट्ठा किया जा रहा है। इसे नाम दिया गया है रिसेप्टर। इसकी मार्किटिंग गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्किटिंग फेडरेशन करेगी। रिसेप्टर को मुंबई के घरेलू और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर स्थित आठ काउंटरों से बेचा जा रहा है। ओरल स्पे पर रिसर्च करने वाली बायोमिक्स नेटवर्क लिमिटेड के चेयरमैन डॉ. पवन सहारन का कहना है कि जन्म देने के बाद दिए गए पहले दूध को कोलस्ट्रम कहते हैं। हम पहले नैनो फिल्टरेशन से इसमें से फैट अलग कर लेते हैं। इसके बाद मिले नैनो पार्टिकल्स को हमने राधा-108 नाम दिया है।
 
भारत और अमेरिका में इसका पेटेंट करा लिया गया है। इसे मुंह में स्प्रे किया जाएगा जहां से यह सीधे दिल के रास्ते पूरे शरीर में पंप हो जाएगा। इसके क्लिनिकल ट्रायल यूएस, नाइजीरिया और भारत में किया गया है। एड्स के मरीजों में भी इससे काफी सुधार हुआ है, फ्लू के मरीजों को भी इससे फायदा पहुंचा है।
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गाय के दूध से नवजातों में नहीं होती है एलर्जी

एक अध्ययन से पता चला है कि जिन शिशुओं को जन्म के बाद से 15 दिन तक उनकी मां गाय का दूध पिलाती हैं उनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है।
 
गाय का दूध बच्चों को भविष्य में होने वाली गंभीर एलर्जी से सुरक्षित करता है।तेल अवीव विश्वविद्यालय में हुए इस अध्ययन ने पहले की सभी धारणाओं को बदल दिया है। पहले माना जाता था कि कि जन्म के तुरंत बाद शिशुओं को कुछ महीने तक गाय का दूध नहीं देना चाहिए।अध्ययनकर्ता यित्झाक काट्ज का कहना है, जो महिलाएं अपने शिशुओं को जन्म के तुरंत बाद गाय का दूध देना शुरू कर देती हैं वे अपने बच्चों को एलर्जी से पूरी तरह बचा लेती हैं।इस अध्ययन के लिए अध्ययनकर्ताओं ने 13,019 शिशुओं के खाने-पीने की आदतों के इतिहास का अध्ययन किया।जिन शिशुओं को जन्म के 15 दिन के अंदर ही गाय के दूध में मिलने वाला प्रोटीन दिया जाने लगा था वे गायों के दूध के प्रोटीन से होने वाली एलर्जी (सीएमए) से पूरी तरह सुरक्षित थे।ये बच्चे उन शिशुओं से ज्यादा सुरक्षित थे जिन्हें जन्म के 15 दिन बाद से गाय का दूध देना शुरू किया गया।
गाय के दूध में मौजूद प्रोटीन से होने वाली एलर्जी (सीएमए) बच्चों के लिए बहुत खतरनाक होती है। इससे उनकी त्वचा पर चकत्ते हो सकते हैं, उन्हें श्वसन संबंधी परेशानियां हो सकती हैं और यहां तक कि उनकी मृत्यु भी हो सकती है। इसलिए यदि जन्म के शुरुआती दिनों में गाय का दूध देना शुरू कर दिया जाए तो वह टीकाकरण जैसा काम करता है।
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दूध और विटामिन डी

विटामिन क्या होता है ?

 
विटामिन वे तत्व हैं जिन के अभाव मे दैनिक जीवन मे हम शरीर द्वारा सब काम ठीक से नही कर पाएंगे. इस लिए यह आवश्यक हो जाता है कि दैनिक आहार से हमे संतुलित मात्रा मे ये सब पदार्थ उपलब्ध हों.विटामिनो को घुलनशीलता के आधार पर, दो श्रेणी में बांटा जाता पानी में घुलनशील जैसे विटामिन बी सी इत्यादि और वसा में घुलनशील जैसे ए, डी, ई, के होर्मोन क्या होता है ?
 
होर्मोन वे जैविक रसायनिक संदेश वाहक तत्व हैं जिन का निर्माण शरीर के अंदर ही विभिन्न ग्रन्थियों और कोशिकाओं में होता है . होर्मोन रक्त द्वारा उन गंतव्य कोशिकाओं पर पहुंचाए जाते हैं जहां से उस होर्मोन की मांग आई थी. अपने गंतव्य स्थान पर आगमन के बाद होर्मोन तुरंत शरीर की संरचना के कार्य मे युक्त हो जाते हैं.

विटामिन डी क्या है?

रसायनिक दृष्टि विटामिन डी दो प्रकार के होते हैं डी2 Ergocalciferol एर्गोकेल्सीफिरोल और डी3 Cholecalciferol कोलेकेसिफिरोल.  प्राकृतिक रूप से शरीर मे विटामिन डी3 होता है. जो कोलेस्ट्रोल अथवा 7 डिहाइड्रोकोलेस्ट्रोल से मानव अथवा उच्च जाति के पशुओं के शरीर मे ही सूर्य की किरणों के प्रभाव से बनता है. जो लोग घरों के अंदर अधिक रहते हैं उन के लिए अपेक्षित मात्रा मे विटामिन डी सुसंस्कृत् आहार आवश्यक हो जाता है . अमेरिका जैसे ठण्डे देश में लोग सूर्य का सेवन कम कर पाते हैं.इस के परिणाम स्वरूप वहां बच्चों में रिकेट (एक पोलिओ जैसा रोग) बहुत पाया जाता था. वैज्ञानिक अनुसंधान से यह पता चला कि यह रोग सूर्य की किरणो से कम सम्पर्क के कारण होता है. इसी लिए पिछली शताब्दी के आरम्भ मे शरीरिक पौष्टिकता और जनता के स्वास्थ्य के हित में अधिकारित तौर पर डी3 को विटामिन का दर्जा दिया गया है. और 1940 से ही अमेरिका मे गाय के डेरी दूध मे अतिरिक्त विटामिन डी को मिलाने के लिए कानून् बनाया गया. जिस के परिणाम स्वरूप अमेरिका मे बच्चों मे Rickets सुखंडीग्रस्त (रिकेट ग्रस्त) बच्चो की सन्ख्या मे 85% तक की कमी देखी गई.

विटामिन डी का महत्व

बिना विटामिन डी के कैल्शियम जैसे खनिज पदार्थ मानव शरीर कू पाचन द्वारा अह्हर से उपलब्ध नही होते. कैल्शियम मानव शरीर मे पाए जाने वाले खनिज पदार्थो मं 70% होता है, क्योंकि सारा अस्थि पंजर कैल्शियम से बना होता है. मानव शरीर की हड्डियां, मुख्य रूप से विटामिन डी के ही द्वारा कैल्शियम के सुपाचन से स्वस्थ और मज़बूत बनती हैं. इसी से लिए कैल्शियम की गोली के साथ विटामिन डी अवश्य मिला कर देते हैं. हड्डियों के कमज़ोरी से रजनिवृक्त postmenopausal महिलाओं को अस्थि रोग अधिक होते हैं.
 
1980 के दशक के बाद केंसर, डायाबिटीज़ , थयरायड और त्वचा के रोग जैसे सोरिअसिस भी विटामिन डी से जोड कर देखे जा रहे हैं.भैंस के दूध मे यद्यपि कैल्शियम तो बहुत होत है परंतु विटामिन डी बहुत कम होता है. इस लिए भैंस के दूध से विटामिन डी की कमी के सारे रोग बढते हैं.. यही गाय के दूध का स्वास्थ्य के लिए महत्व है.

विटामिन डी की व्यक्तिगत आवश्यकता

मानव सभ्यता के विकास के साथ घरों में अंदर रहने के साथ कपडे पहन कर रहना मानव की त्वचा पर सूर्य की किरणों के सीधे सम्पर्क को कम करते हैं. इस प्रकार साधारण रूप से प्राकृतिक विटामिन डी की कमी मानव शरीर मे आहार के द्वारा पूरी करने की आवश्यकता बनती है.
अमेरिका मे ऐसा बताया जाता है कि साधारण रूप से संतुलित आहार के साथ साथ. हाथ मुख इत्यादि शरीर के नंगे भाग को मात्र 10 मिनट प्रति दिन सूर्य के दर्शन शरीर भी विटामिन डी द्वारा शरीर की आवश्यकता के लिए पर्याप्त है. ( भारतीय परम्परा मे दैनिक सूर्य नमस्कार का यही महत्व देखा जा सकता है )

मानव शरीर के लिए विटामिन डी के मुख्य स्रोत

सूर्य के दर्शन के अतिरिक्त, समुद्र की मछलियों मे विटामिन डी की प्रचुर मात्रा पाई जाती है. परंतु शाकाहारियों के लिए, गाय का दूध और उस के बने पदार्थ ही विटामिन डी का एक मात्र स्रोत हैं.
 
कृत्रिम विटामिन का उत्पादन 
 
दूध मे विटामिन डी बढाने के लिए कृत्रिम विटामिन डी बनाने की आवश्यकता हुई. विदेशों में गाय के आहार 
और दूध दोनों मे अतिरिक्त विटामिन डी मिलाया जाता है.
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एथलीटों का प्रदर्शन होगा गाय के दूध से बेहतर

अब वैज्ञानिक इससे एथलीटों के प्रदर्शन में सुधार की संभावनाएं तलाश रहे हैं।वैज्ञानिकों के अनुसार यह एथलीटों में \'लीकी गट सिंड्रोम\' जैसी बीमारी को दूर कर सकता है, जिससे उनका प्रदर्शन प्रभावित नहीं होगा। बछड़े को जन्म देने के कुछ दिन बाद गाय जो दूध देती है, उसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और कीटाणुओं से लड़ने में सक्षम प्रोटीन के विकास की प्रचुर संभावना होती है।\'लीकी गट\' की शिकायत एथलीटों में अधिक पाई है। इसमें आंतों से वे तत्व निकल जाते हैं, जो खून में विषैले पदार्थो को जाने से रोकते हैं। ऐसे में डायरिया की शिकायत भी हो सकती है। अमेरिकन जर्नल ऑफ फिजियोलॉजी-गैस्ट्रोएंटेस्टिनल एंड लिवर फिजियोलॉजी में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार यह सब अंतत: शरीर के अंदरूनी हिस्सों को क्षतिग्रस्त कर सकता है।बार्ट्स एंड द लंदन स्कूल ऑफ मेडिसिन एंड डेंटिसरी के प्रोफेसर रे प्लेफोर्ड के अनुसार, "लीकी गट के कारण एथलीटों द्वारा अधिक शारीरिक श्रम की स्थिति में उनका प्रदर्शन गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है।"

प्लेफोर्ड की टीम ने एथलीटों से 20 मिनट तक सामान्य कसरत से 80 प्रतिशत अधिक शारीरिक श्रम करने को कहा। कसरत के बाद वैज्ञानिकों ने मूत्र और उनके शारीरिक तापमान के जरिये उनमें \'लीकी गट\' की शिकायत का अध्ययन किया।
उनमें \'लीकी गट\' 250 प्रतिशत तक बढ़ा पाया गया। लेकिन जिन लोगों को अभ्यास से दो सप्ताह पहले जल्द ही बछड़े को जन्म देने वाली गाय का दूध दिया गया, उनमें \'लीकी गट\' 80 प्रतिशत तक कम पाया गया।

-सुबोध कुमार 

Thursday, November 24, 2011

क्या अन्ना गांधीवादी हैं?

अभी तक तो बाबा रामदेव ही कहते थे, बीड़ी, सिगरेट, शराब, तम्बाकू बन्द करो. अब अन्ना जी भी इसी श्रेणी में आ गए, और फंस गए. मीडिया और नेता हाथ धोकर उनके पीछे पड़ गए.

जो भी शराब, सिगरेट, वेश्यावृत्ति, गोमाता की हत्या, गंगा का प्रदूषण, प्राकृतिक भू-सम्पदा का दोहन, भ्रष्टाचार, कालाधन का मुद्दा उठाएगा, और इन  सामाजिक बुराइयों से लड़ने की बात करेगा, वह गाँधीवादी नहीं रह जाएगा.  सत्ता रुपी शराब के नशे में डूबे लोग गांधीवाद का मतलब अपने अनुसार से निकालते हैं. ये सब के सब विदेशी हाथों में बिके हुए है. जैसे ही इनके विदेशी आकाओं का हित प्रभावित  होता है, ये चीखने चिल्लाने, हाय तौबा मचाने लगते हैं. आखिर इन्होने ही तो शराबखाने, लौटरी और ना जाने  क्या क्या क्या धंधे खोल रखे हैं. मीडिया भी इनके साथ हाँ में हाँ मिलाकर सुप्रीम कोर्ट की भूमिका में आकर अपना निर्णय सुनाने लगती है. आखिर मीडिया की कमाई भी तो इन्हीं विदेशी कंपनियों के घटिया सामान के झूठे विज्ञापन और खोखली सरकारी योजनाओं के झूठे विज्ञापन से आती है.

शराब और सिगरेट की वकालत करनेवाले लोगों का हित जरूर इनकी बिक्री से जुड़ा हुआ है. कुछ ने कहा कि शराब एक सामाजिक समस्या है, इसका हल counselling से  होगा. तो अरे अंग्रेज भाई साहब, ये समझाना बुझाना counselling नहीं तो किस चिड़िया का नाम है? कुछ लोगों ने कहा, यह एक बीमारी है, अस्पताल में इसका इलाज होगा. अब जिसके पास खाने को पैसे नहीं है, शराब पीकर उसकी हालत पतली हुई पड़ी है, वह कहाँ से इलाज के  पैसे लाएगा? एक गरीब  जिस दिन कमाता है, उस दिन उसका चूल्हा जलता है. अगर महीने भर अस्पताल में पड़कर  इलाज करवाएगा तो उसका  परिवार और वह क्या खायेगा? किसीने इन बिन्दुओं पर सोचा क्या? आखिर इन सब मुसीबतों कि जड़ शराब कारखाने ही बन्द करवा दें तो क्या नुकसान है? फिर कुछ बुद्धिजीवियों ने कहा कि इसके होने से हजारों लोग बेरोजगार हो जायेंगे और सरकार  का टैक्स वसूली कम हो जाएगा.  तो फिर चोरी डकैती के भी लाइसेंस दे  डालो. इससे भी तो कई  लोगों को रोजगार मिल सकता है. और फिर टैक्स मिलेगा सो अलग.

मैं इन सब शराब के प्रेमियों से एक ही सवाल पूछता हूँ, मुझे शराब पीने के एक-दो फायदे ही बता दें, मैं जानकर  धन्य हो जाऊँगा.

अब रहा "क्या अन्ना गांधीवादी हैं?" जैसे सवाल उठाने वाली मीडिया का. क्या कभी मीडिया ने निहत्थे लोगों पर गोली, लाठी, आंसू गैस  चलवाने वाली सरकारों से पूछा, "क्या तुम गांधीवादी हो?" क्या मीडिया ने शराब के लाइसेंस बाँटनेवाली सरकारों से पूछा, "क्या तुम गांधीवादी हो?" क्या मीडिया ने विदेशों में पैसे रखनेवालों का नाम जाननेवाली, पर बहाने बना बना कर उसे नहीं बतानेवाली  सरकारों से पूछा, "क्या तुम गांधीवादी हो?" ऐसे सैकड़ों नहीं हजारों प्रश्न उठाये जा सकते हैं, और उन सब का एक ही उत्तर मिलेगा "नहीं". तो फिर अन्ना के पीछे हाथ धोकर पड़ने का कारण क्या है?
मुझे तो कई बार नकली दूध, नकली मावा, नकली सौंदर्य प्रसाधन के पकडे जाने की खबर भी इन्हीं विदेशी कंपनियों द्वारा प्रायोजित लगती है. वे यहाँ के लोकल व्यापार को  बन्द करवाकर अपना पैकेट में बन्द अपना माल बिकवाना चाहते हैं. पैसों की भूखी मीडिया भी इनका साथ देगी क्योंकि इनके पास पैसा है. एक रूपये की चीज़ को सौ में बेचते हैं. घटिया चीज़ों को झूठे  विज्ञापनों द्वारा अच्छा प्रचारित करते हैं. और फिर विज्ञापनों की कमाई  से मीडिया मालामाल होता रहेगा.
अभी तो अन्ना ने केवल शराबियों का यह हाल करने को कहा है. अगर आन्दोलन और अनुनय विनय पर सत्ता रुपी शराब का सेवन कर इसके नशे में धुत्त होना  इन राजनीतिज्ञों ने बन्द नहीं किया तो इनका भी हाल जनता वैसा ही न करे, जैसा अन्ना ने बताया है.
जब भी भ्रष्ट और झूठे राजनीतिज्ञ वोट मांगने आयें, जनता उनको कान पकड़ कर उठक बैठक करने को कहे,  मेढक कूद करने को कहे, और भी ना मानें तो मंदिर/मस्जिद के खम्भे में बांधकर खाना पीना बन्द कर दे. और अंत में, फिर भी ना मानें तो गधे पर बिठाकर, सर मुंडवा कर गाँव गाँव, शहर शहर घुमाए. भारत में ऐसी ही सजा का प्रावधान हैं अंग्रेजों के मानस पुत्रों.

परन्तु जैसा कि हर गांधीवादी कहता है, मैं भी कहूँगा, मार पीट और हिंसा मत करो भाइयों, चाहे वे हमारा  कुछ भी कर डालें.

Monday, October 31, 2011

नॅशनल डैड सैंट गाँधी और उनका राष्ट्रभाषा हिंगलिश के प्रति डेडिकेशन

बहुत दिनों से सोच रहा था मैं भी आधुनिक बन जाऊं और पिछड़ी सोच का दकियानूसी विचारक का चोला उतार फेंकूं . सोचा, इसकी शुरुआत कहाँ से करूं. मैनें पढ़े लिखे, आधुनिक, और संभ्रांत कहे जाने वाले कुछ लोगों का छुप छुप कर अवलोकन करना प्रारंभ किया. उन्हें शान से सूट पैंट और टाई लगाकर, गर्दन में एक विशेष अकड़ और होठों पर एक विशेष लयबद्धता  के साथ  अंग्रेजी को जबरदस्ती मातृभाषा में ठूंस ठूंस  कर बोलते देखा करता . उन्हें समाज में विशेष सम्मान मिलता देखता तो मेरे कलेजे पर भी सांप लोट जाता था. अंततः निष्कर्ष निकाला, मातृभाषा के शब्दों का अंग्रेजी की तरह उच्चारण करना भी एक  प्रकार कि उच्चता को दर्शाता है.  अपनी भाषा बोलते बोलते अंग्रेजी में कुछ गिट पिट करना आधुनिकता का पर्याय बन चुका है. बीच बीच में हिंदी के किसी सामान्य शब्द को अंग्रेजी शब्द से बदल कर यह दिखाना कि हमें उसकी हिंदी नहीं आती, (What do you call it in Hindi) जैसे वाक्य हर चार पांच मिनट के संवाद में बोलना भी  एक प्रकार कि आधुनिकता और संभ्रांत होने की निशानी है, अन्यथा लोग फिसड्डी समझ बैठेंगे.  मेरा भी मन करने लगा था कि मैं भी इन जैसा बन जाऊं.

अब तो हमारी सरकार के राजभाषा विभाग ने भी मन बना ही लिया है कि अगर हिंदी को समृद्ध करना हैं तो अंग्रेजी के शब्दों को बिना हिंदी में ठूंसे यह असंभव है. आखिर हिंदी को बोलना कितना कठिन काम है?  छात्र, विद्यालय, शिक्षक जैसे शब्द कितने कठिन, पुराने और घटिया लगते है. अब देखिये स्टुडेंट, स्कूल, टीचर बोलें तो कितना आसान, सभ्य और आधुनिक लगता है.  परिचय पत्र तो लगता है जैसे मंगल ग्रह से आनेवालों का पूछा जाता है. इस ग्लोबलाइजेशन के जमाने में तो आईडेनटीटी कार्ड पूछना ही सभ्यता का प्रतीक है.

मैंने कुछ बुद्धिजीवियों से जब इस भाषा के सरलीकरण (खिचड़ीकरण)  पर विचार जानना चाहा तो उन्होंने इसका स्वागत किया. उनके अनुसार भाषा विचारों के व्यक्त करने का एक माध्यम भर है. उसे सभ्यता, संस्कृति,  इतिहास, समाज, धर्म, मानसिकता, मनोविज्ञान, दर्शन से जोड़ना  उचित नहीं है. भाषा जितनी सरल होगी, बोधगम्य होगी विचार उतना ही रुचिकर होगा.  अगर इस  आधुनिकता के दौर में सफल लेखक होना है तो इसी प्रकार के बोधगम्य भाषा का प्रयोग करना होगा. फिर मैंने भी एक ऐसा ही बोधगम्य लेख लिखने  की ठान ली. सोचा, ऐसा विषय लूं जो हिंदी भाषा का प्रचारक हो, किसी राष्ट्रनायक जिसने हिंदी के लिए अपना सर्वस्व अर्पण किया हो से प्रेरित हो , जन जन के हृदय  को उद्वेलित करे और मेरी भाषा सभी को समझ में आ जाए. बहुत सोच विचार कर मैंने एक विषय सोचा है, आशा है आप उसपर अपने  विचार व्यक्त करें तो आगे लिखना प्रारंभ करूंगा.     

"नॅशनल डैड सैंट गाँधी और उनका राष्ट्रभाषा हिंगलिश के प्रति डेडिकेशन"

अगर देवनागरी में इसका अर्थ समझ में ना आये तो रोमन में  भी नीचे लिख ही देता हूँ, आधुनिक बनना है तो देवनागरी प्रेम छोड़कर रोमन प्रेम करना  ही पड़ेगा.

National Dad Saint Gandhi aur unka rashtrabhasha HInglish ke prati dedication

आशा है आप सब लोग मुझे आधुनिक बनने में अवश्य ही सहायता प्रदान कर अनुगृहीत करेंगे.

Sunday, August 21, 2011

अन्ना के आन्दोलन की तस्वीर का दूसरा रूख


सबसे पहले पाठकों को मैं यह साफ़ कर दूं कि मैं जन लोकपाल बिल को इसी रूप में शत प्रतिशत लागू करवाने का पक्षधर हूँ और श्री अन्ना हजारे जी के अनशन और आन्दोलन का समर्थक हूँ. मुझे अन्ना और उनकी टीम के इमानदार और देशभक्त होने पर कोई संदेह नहीं है. पर घटनाक्रम जिस तरह से मोड़ ले रहे हैं, बड़ी असमंजस की स्थिति बनी हुई है.

आज अन्ना के अनशन का छठा दिन है. अन्ना का आन्दोलन अब परवान चढ़ चुका है. पूरे देश भर में अन्ना के नाम की धूम मची है. जनता खुश है कि आन्दोलन सफल हो रहा है और अनशन चल रहा है. सरकार डरी  सहमी नजर आ रही है. सरकार की तरफ से अन्ना पर हमला बन्द हो चुका है. जो कुछ दिनों पहले तक अन्ना को सर से लेकर पैर तक भ्रष्टाचार में डूबे दिखाई दे रहे थे, जिनकी सेना में की गई सेवा पर उंगलियाँ उठाई जा रहीं थीं, गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे थे. अब एकाएक सत्तारूढ़ दल के लोगों को उन अन्ना के प्रति प्यार और श्रद्धा से ओत प्रोत देखा जा रहा है. पर यह सब कुछ  एक सोची समझी साजिश के अंतर्गत हो रहा है.

मीडिया रात दिन लगातार अन्ना को महानायक बनाकर प्रस्तुत किये जा रहा है. आखिर करे क्यों नहीं, २ मिनट कार्यक्रम के बाद कम से कम १० मिनट के विज्ञापन जो मिल रहे हैं. कुछ लोगों के लाइव कैमरे के सामने इस जन आन्दोलन पर विचार मांगने पर एक भाई ने यहाँ तक कह डाला की मनमोहन सिंह अपने पोते पोतियों को कैसे मुंह दिखाते हैं? मनमोहन सिंह के प्रति इस ह्रदय की आवाज पर चैनल का पत्रकार क्षमा मांगते नजर आया, जिसका कोई तुक मुझे नहीं नजर आया. शायद देश के कई करोड़ लोग इस बात से सहमत हों. इसके लिए पिछले एक वर्ष का घटनाक्रम जिम्मेदार है. मैं स्वयं निजी तौर पर कांग्रेस और नेहरु के परिवारवाद का घोर विरोधी था पर श्री मनमोहन सिंह  जी के प्रति मन में अत्यंत श्रद्धा थी. पर पिछले एक वर्षों के घटनाक्रम ने सबकुछ बदल कर रख दिया. खैर ये अलग मामला है, लौटते हैं मुख्य विषयवस्तु पर और बात करते हैं रामलीला मैदान के इतिहास, धरने और मीडिया के सौतेले रूख की.

इसी रामलीला मैदान पर २३ फ़रवरी २०११ को देश के लगभग सारे बड़े मजदूर संगठनों  का आन्दोलन था. लाखों लोग आये. इस तरीक़े से ये कहने की कोशिश हुई कि अगर कामगार वर्ग का जीवन सुधारा जाए तो आर्थिक मंदी से निबटने की ये एक सही रणनीति हो सकती है. पर मीडिया ने कहा कि इस धरना प्रदर्शन से लोगों को घरों से कार्यालय और कार्यालय से घर जाने में दिक्कत हुई. आम जनता का जनजीवन अस्त व्यस्त हो गया. जैसे गरीब कामगार मजदूर आम जनता के हिस्सा नहीं हैं और वे मौज मजे के लिए अपना घर, काम धंधा  छोड़कर धरना प्रदर्शन  करने गए थे.

इसी रामलीला मैदान पर २७ फरवरी २०११ को लाखों लोगों की भीड़ इकट्ठी हुई थी भ्रष्टाचार और व्यस्था परिवर्तन के आन्दोलन के लिए जिसमें स्वयं अन्ना जी, किरण बेदी जी, अरविन्द केजरीवाल जी के अलावा अन्य कई बड़े नेता, समाजसेवी, धार्मिक नेता, धर्मगुरु उपस्थित थे. उस आन्दोलन, धरना प्रदर्शन का एक भी समाचार किसी भी समाचार चैनल पर नहीं दिखा. वहीं से पूर्व आयकर अधिकारी श्री विश्व बन्धु गुप्ता जी ने बड़े बड़े खुलासे किये. पर कहीं कोई खबर नहीं दिखी, मीडिया खामोश रही.

फिर आया ४ जून. मीडिया ने ४ जून के पहले तो बाबा रामदेव को खूब  दिखाया, हीरो बनाया, पर एकाएक उलटी गंगा बहने लगी. सबके सुर बदल गए. बाबा का आन्दोलन मीडिया और सरकार को साम्प्रदायिक लगने लगा. बाबा आर एस  एस का मुखौटा पहने कठपुतली नजर आने लगे. बाबा के अनशन पर उंगलियाँ उठने लगीं. बाबा  का शामियाना लोगों को पांच सितारा स्थान लगने लगा था. वस्तुतः हर जगह मीडिया सरकार का मुखौटा नजर आने  लगी. रात को जब निरीह जनता पर लाठी और आंसू गैस के गोले छोड़े गए, स्टेज पर आग लगाई गई, आग बुझानेवालों को बुरी तरह से पहचानकर पीटा गया, महिलाओं को शौचालय से घसीट घसीट कर मारा गया, उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया,  और अँधा धुन्ध आंसू गैस के गोले छोड़े गए, इन सब को मुख्य मुद्दा और सरकार द्वारा किया गया महा अपराध बनाने के बजाय बाबा रामदेव को महिला के कपडे में भागने को सरकार और मीडिया द्वारा अपराध घोषित कर दिया गया. उस समय देश भर में धरना प्रदर्शन किया गया पर मीडिया ने उस प्रकार से प्रचारित नहीं किया बल्कि उसे बाबा रामदेव के विरुद्ध माहौल बनने का प्रयास किया गया. कहा गया की बाबा ने गिरफ्तारी नहीं  दी, जबकि बाबा के बार बार गिरफ्तारी देने की बात पुलिस ने नहीं सुनी और अत्याचार नहीं रोका.  बाबा  के ट्रस्ट और व्यापारिक संस्थान (मैं उसे समाजसेवा और देशसेवा का संस्थान मानता हूँ) के संपत्ति  और क्रियाकलापों पर उंगलियाँ उठने लगीं. और तो और, इतने बड़े काण्ड पर अमेरिका को यह भारत का आतंरिक मामला लगा.

पर १६ अगस्त का घटनाक्रम एकदम अलग है. मीडिया तो गुणगान कर ही रही है, अमेरिका ने भी आन्दोलन  में अपनी नाक घुसेड़ना उचित समझा और अपनी नसीहत दे डाली. जबकि सरकार ने कोई जोर जबरदस्ती या ज्यादती न तो अन्ना जी  पर की, न ही जनता पर. कुल मिलाकर शक की सूई मीडिया, सरकार और विदेशी पूंजीवादियों की तिकड़ी पर जा रही है. ये सब मिलकर क्या गुल खिला रहे है, यह समझना आम जनता के लिए टेढ़ी खीर हो सकता है, पर किरण बेदी, अरविन्द केजरीवाल, प्रशांत भूषन सरीखे विद्वानों और बुद्धिजीवियों के लिए नहीं. क्या वे राजनीति और व्यापार की साजिश से वे सचमुच अनभिज्ञ हैं या उन्हें लोकपाल से ज्यादा कुछ और समझने की दूरदृष्टि नहीं है? अगर वे सब समझ रहे हैं तो फिर वे इस तिकड़ी की चालों से बचने के लिए क्या कर रहे हैं, यह एक चर्चा और चिंतन का विषय है.

मीडिया को इस आन्दोलन से कुछ नहीं लेना देना है. भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों से उनको कोई दुश्मनी नहीं है. उनका काम है टी आर पी बढ़ता रहे, विज्ञापन आत़े रहें, मुनाफा आता रहे बस.

सरकार और विपक्ष दोनों की रणनीति किसी प्रकार से ऐसे क़ानून को लाने की है, जिससे खानापूर्ति हो जाए, वाहवाही मिल जाए कि इस संसद ने ऐतिहासिक काम कर दिखाया, इस सरकार ने दशकों से अधर में लटके लोकपाल को पारित कर दिया. उस कानून में इतने छेद हों कि उसे राजनेता अपने प्रकार से समय आने पर तोड़ मरोड़ कर अपना उल्लू सीधा कर सकें. आखिर सरकार चलाना राजनेताओं का ही काम है न. जनता और बुद्धिजीवियों को क्यों राज काज में रुचि होनी चाहिए?

जहां तक विदेशी पूंजीवादियों का सवाल है, भारत उनके लिए बाजार मात्र है. यहाँ ऐसा कुछ  नहीं होना चाहिए जिससे उनके सामानों कि बिक्री पर असर पड़े. यहाँ कोई जन आन्दोलन ऐसा न हो, सामाजिक व्यस्थाए ऐसी न हों जिससे भारत आत्मनिर्भर हो सके. यहाँ का सामाजिक ताना बाना मजबूत हो, आम जन का जीवन स्तर, स्वास्थ्य का स्तर ऊपर उठ सके. बाबा रामदेव का आन्दोलन सिर्फ भ्रष्टाचार का आन्दोलन नहीं बल्कि एक सामाजिक आन्दोलन भी है. उनके उत्पादों का बाजार में दिनोदिन ज्यादा बिकना विदेशी कंपनियों के लिए खतरा बन चुका है. उनके ग्रामोत्थान और स्वदेशी के विचार मात्र से ही विदेशी लुटेरी कम्पनियाँ और सत्ता के दलाल चिढ़े बैठे हैं.

इन तीनों नजरिए से देखने पर लगता है कि अन्ना का आन्दोलन इन सबके लिए लाभदायक है. अन्ना के आन्दोलन से एक तीर से दो शिकार हो रहे हैं. टीम अन्ना ने अपने आपको बाबा  रामदेव से बिलकुल अलग कर लिया है, और अपने रास्ते को ही गांधीवादी रास्ता मान कर चल रहे है. परन्तु देखा जाए तो बाबा रामदेव का रास्ता और आन्दोलन भी इसी उद्देश्य के लिए था. बल्कि उसमें कुछ शर्तें और सिद्धांत  और भी बेहतर भारत  के निर्माण  के लिए थीं. मजबूत लोकपाल (टीम अन्ना वाला) तो एक मुद्दा था ही, स्विस और अन्य विदेशी बैंकों में  जमा भारत का पैसा सबसे बड़ा मुद्दा था. इससे बहुत बड़ा नुकसान विदेशी पूंजीनिवेशकों, जोंक की तरह हमारे पैसे पर चलने वाली विदेशी सरकारों और विदेशी कंपनियों पर तो होने ही वाला था, यहाँ की आम जनता का खून चूसनेवाले  राजनीतिक दलों और राजनेताओं की भी शामत आनेवाली थी. बाबा रामदेव ऊपर बताये गए तीनों के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं. ४ जून की घटना के बाद बाबा रामदेव और भी अधिक ताकत से अपना आन्दोलन तेज करने की योजना बना रहे थे. सरकार ने अपना दांव बड़े ही सधे तरीके से खेला. टीम अन्ना को जैसे तैसे बाबा रामदेव से किनारा करने के दांव खेले और सफलता भी मिली. अब आन्दोलनकारी और जनता बंटे हुए हैं. जान बूझ कर अन्ना को हीरो बनाने के लिए सरकार, मीडिया और विदेशी पूंजीवादी खेल खेल रहे हैं ताकि लोगों का ध्यान बाबा रामदेव से हट कर रहे जो उनके लिए एक बड़ा खतरा बन कर उभरे हैं. इस बारे में  कोई दो राय नहीं कि टीम अन्ना पर किसी को शक नहीं होना चाहिए, पर उनको एक बड़े खेल का मोहरा बनने से बचने के लिए खुलेआम बाबा रामदेव के साथ और समर्थन का एलान भी कर देना चाहिए. इससे देश को बचाने का आन्दोलन भी मजबूत होगा और सरकार और पूंजीवादियों की बाबा रामदेव के आन्दोलन की शक्ति को काम करने की चाल भी नाकामयाब होगी. सरकार के शर्तों पर आन्दोलन करके न तो कोई सफल हुआ है और न होगा. बाबा रामदेव के सरकार के सबसे बड़े दुश्मन बन जाने का कारण  भी यही था कि दूरदर्शिता का परिचय देते हुए उन्होंने सरकार की  शर्तों पर  खेल का हिस्सा बनने से इंकार कर दिया था. टीम अन्ना भी दूरदर्शिता का परिचय दे और देश में उठ रही आन्दोलन की आंधी को कमजोर होने से बचा ले.

Friday, July 1, 2011

सबको अपना अपना काम करना चाहिए - एक संवाद



आजकल बिकी हुई मीडिया और कुछ "क्षुद्रबुद्धि बुद्धिजीवी" लोगों द्वारा ये प्रचारित किया जा रहा है कि सबको अपना अपना काम करना चाहिए. जिसका जो काम है उसे वो करना चाहिए, और दूसरों को उनका काम करते रहने देना चाहिए. अन्यथा लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा.

बात भी सही है. बाबा को योग सिखाना चाहिए. "राम नाम जपना - पराया माल अपना" का प्रवचन देकर भक्तों का पैसा डकार जाना चाहिए, बड़े से वातानुकूलित आश्रम में बैठकर  अपने भक्तों से चरण पुजवाने चाहिए. धर्म और अध्यात्म में पुरुषार्थ और अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़ने के उदाहरण भरे पड़े होने के बावजूद जनता को झूठ मूठ की मनगढ़ंत कहानियाँ सुनाकर अकर्मण्य बने रहने की शिक्षा देनी चाहिए. तुम बैठे रहो, भगवान् सब ठीक कर देगा, तुम बस दान पुण्य करो, तुम केवल कर्म करो (जिसमे मुझे फल मिले), तुम फल की चिंता मत करो. नेताओं को दोनों हाथों से जनता की गाढ़ी कमाई का धन लूटने देना चाहिए. सरकारी खर्चे पर सपरिवार ही नहीं, लाव लश्कर, दोस्त रिश्तेदार और SPG की पूरी टीम सहित विशेष विमान में विदेश की जितने बार चाहे सैर करने देना चाहिए. आखिर किस लिए जनता ने चुन के भेजा है इन्हें? वाह रे धर्मगुरु और धर्म के ठेकेदार, वाह रे जन प्रतिनिधि और सत्ता के ठेकेदार.

अब  ये बाबा जो ११००  करोड़ की संपत्ति होकर भी जमीन पर सोता है, दो जोड़ी भगवा कपडे पहनकर सालों समय निकाल लेता है, प्रतिदिन १८-२० घंटे काम करता है, जिसके चेले बिना पारिश्रमिक लिए बाबा के एक आदेश पर जान निछावर करने के लिए तैयार होते हैं, कौन होता है हमारी लूट को बन्द करने का आह्वान करनेवाला?

किसान खेती करे, विद्यार्थी पढ़ाई करे (वही पढाई करे जो हम पढ़ाते हैं......खबरदार जो इतिहास को सही तरीके से जानने की कोशिश की), दुकानदार दुकान चलाये (खबरदार जो ज्यादा पैसे कमाए, हमने इतने प्रकार के टैक्स और नौकरशाही जो लूटने के लिए लगाईं है), गृहणी घर का झाड़ू पोंछा करे, अभिनेता फिल्म बनाए पैसे कमाए (हमें चुनाव में जरूर खर्चे के लिए पहुंचाए और मुफ्त में चुनाव प्रचार कर जाए) ...लोगों की शादी में नाचे और पेप्सी बेचे. क्रिकेटर जूते और कोक बेचे......गिफ्ट में फरारी ले.  हम अखबार और चैनल चलायें, अपनी सुविधा के अनुसार समाचार और विज्ञापन दिखाएँ (ख़बरदार किसी ने सच्चाई दिखने कि कोशिश की), हम अपनी मर्जी से देश चलायें.

ये भूखी नंगी जनता........ दो कौड़ी के लोग .....खेती बाड़ी, मेहनत मजूरी  छोड़ के यहाँ क्या कर रहे हैं, दिल्ली में ये  अनशन करेंगे तो हमारी बेटी की शादी में छप्पन भोग बनाने के लिए अन्न कौन उगाएगा, हमारी राजनैतिक रैलियों में एक बोतल शराब और १० रुपये लेकर कौन भंगड़ा करेगा..... इनका  बाप? हमें उड़ाने के लिए करोड़ों रुपये कहाँ से आयेंगे? और अगर ये आत्महत्या नहीं करेंगे तो हमें कृषि और ग्रामीण विकास के ऊपर लाखों करोड़ खर्च करके धनोपार्जन करने का सुनहरा मौका कैसे उपलब्ध होगा?

ऊपर से इन्हें मालूम ही क्या है काले धन की इन कानूनी पेचीदगियों का, अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अर्थशास्त्र का? कितनी मुश्किल से हमने इस लूट के पैसों को ठिकाने लगाने का कानून बनाया है, इन पैसों को सुरक्षित करने के लिए अंतरराष्टीय संधियों में देश को फंसाया है, इन पैसों को भारत में पुनः  निवेश करने के लिए कितने सारे पेचीदे कानून और रास्ते बनाए हैं. बड़ा दिमाग लगता है इसमें, इन्हें क्या पता? इन्हें जा के अपना काम करना चाहिए, किसी तरह पेट भरने का जुगाड़ करना चाहिए. हमने मौका छोड़ा ही कहाँ है इनको आसानी से पेट भरने के लिए? फिर भी इन्हें सरकार के कामों की, अपने अधिकारों की, काले धन की पड़ी है? इन्होने क्या ठेका ले रखा है देश का .... ये काम इन्हें  कपिल सिब्बल, चिदंबरम, मोंटेक, मनमोहन सिंह, बरखा दत्त, नीरा राडिया, ए. राजा, कनिमोड़ी, कलमाडी और वीर संघवी के लिए छोड़ देना चाहिए. ये सब विद्वान् पढ़े लिखे, जनता के द्वारा चुने (?) हुए लोग हैं, देश को अपने हिसाब से सँभाल लेंगे.

अनशन और सत्याग्रह से कोई समस्या हल नहीं होती है. दम है तो नक्सली बन के दिखाएँ ताकि हमें भी लड़ाई करने में थोडा मजा आये, कुछ इनके लोग मरें, कुछ मुफ्त में तनख्वाह ले रहे BSF, आर्मी, स्पेशल फ़ोर्स के लोग मरें. सरकारी तनख्वाह ले रहे लोगों को कुछ करने धरने, मरने मारने का मौका मिलना चाहिए या नहीं? कितना काम करवाएं इनसे हम अपने बंगलों और फैक्टरियों पर?  समाज चलाना ये संतों, साधू, सन्यासियों और भोली भाली आम जनता का काम नहीं.

पर मेरे भाई जरा पीछे नज़र तो मारो. ये देश जो आज थोडा बहुत कुछ है इसमें, स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानंद, महर्षि औरबिन्दो, संत विनोबा, बाबा आमटे, सुन्दरलाल बहुगुणा  जैसे संतों, देशभक्तों, समाजसेवकों की ही देन है. समाज को इन्ही लोगों ने सुधारा, जात पात, छुआ छूत , बाल विवाह, सती प्रथा, स्त्री शिक्षा, बंटे हुए समाज को जोड़ने का काम किया. पर तुम जैसे लोकतंत्र  के परदे के पीछे बैठे तानाशाह लोगों ने देश का धन लूटने के अलावा क्या किया? आज़ादी के ६३ साल बीत गए, अंग्रेजों की बनाई व्यस्था को थोड़ा  भी नहीं बदला. आज भी इस देश में तीन हज़ार से ज्यादा क़ानून अंग्रेजों के बनाए चल रहे हैं.  जो जात पात इस देश से जा रहा था उसे पुनर्स्थापित किया मंडल कमीशन लाकर वी पी सिंह नामक अवसरवादी व्यक्ति ने.  आरक्षण की राजनीति, जाट आन्दोलन, गुर्जर आन्दोलन, विकराल भ्रष्टाचार, क्षेत्रवाद, भाषा की लड़ाई .....ये सब किसकी देन है? लोकतंत्र  के परदे के पीछे बैठे इन तानाशाह generals की. अब इसे ठीक कौन करेगा? ये लोग, जिनका रोजगार ही फूट डालो राज करो की कुटिल नीति से चलता है? .

जी नहीं .......ये तथाकथित जन प्रतिनिधि जनता के हक़ का पाई पाई खा जायेंगे और डकार भी नहीं लेंगे. बेशर्मों की तरह अगली बार फिर हाथ जोड़, "एक मौका और" कहकर वोट मांगने आ जायेंगे. हम और आप यूँ ही रोज मर मर कर जीते रहेंगे, और ये हर बार की तरह सारी मलाई मार जायेंगे.

स्वामी रामदेव जी, आचार्य बालकिशनजी और उनके साथ खड़े हजारों संतों के नेतृत्व में आप और हम मिलकर इस देश को बचा सकते हैं.